जेट स्ट्रीम निर्माण और विशेषताएं

जेट पवन -

                    ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण के संदर्भ में विशेष ज्ञान द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अधिक वैज्ञानिकता से स्पष्ट हुई जेट धाराएं की सकल्पासं का विकास इन्हीं वैज्ञानिक अनुसंधान का विकास है द्वितीय विश्व युद्ध दौरान B-29 विमान अमेरिका से जापान की ओर बम गिराने के लिए चलते थे तो इनके यान के वेग में कमी आ जाती थी और जब बम गिराके जापान से अमेरिका की ओर वापस लौटते थे तो इनके यान का वेग बढ़ जाता था विश्व युद्ध के बाद जब इन कारणों का अधिवेशन किया गया तो पता चला कि क्षोभमण्डल  के ऊपरी सीमा में अत्याधिक तीव्र से प्रभावित होने वाली पवने चलती है जो वायुयान के वेग को प्रभावित कर देते हैं इन्हीं क्षोभमण्डलीय पवन को जेट का नाम दिया गया !

            जेट पवन से तात्पर्य क्षोभमण्डल की सीमा में 7 से 14 km की ऊंचाई पर प्रवाहित होने वाली तीव्र एवं भूविक्षेपी पवन से है जो सामान्य रूप से पश्चिम से पूर्व की ओर सालों भार प्रवाहित होती है उत्तरीय गोलार्ध में ग्रीष्म की तुलना में शीत ऋतु में जेट पवने अधिक प्रभावकारी होती हैं तथा बड़े पैमाने पर मौसमी दशाओं को प्रभावित करती हैं!

जेट पवनो की विशेषताएं-

                                     1- जेट पवन का वेग 120 km/h से अधिक होती हैं।

2- ये ‌‌‌‌‌‌‌‌‌त्रिविनिय होती हैं अर्थात् इन पवनो में लम्बाई चौड़ाई एवं ऊंचाई भी होती है सामान्य रूप से जेट पवनो की लम्बाई 3000 km तक जबकि चौड़ाई 50 km एवं ऊंचाई 1 से 3 km तक होती है।

3- किनारे की अपेक्षा बीच में इन पवनो का वेग अधिक होता है।

4- इन्हें परिधुवीय पवन भी कहते हैं क्य़ोकि इनका प्रभाव सम्पूणं लोक पर दिखाई देता हैं।

5- ये श्रृंग और गर्त के रूप में प्रवाहित होते हैं जहां पर जेट के श्रृंग पाते जाते हैं धरातल पर ठीक नीचे लगभग चकवतीच दशा पाई जाती है जबकि जहां जेट पवने के गर्त पाये जाते हैं  वहां पर धरातल के पास प्रति चक्रवती दशा देखनो को मिलती हैं।     

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