अमेरिका ने इराक पर पाबंदी बहाल कर पेट्रोलियम के बाजार की अस्थिरता को बढ़ाने के साथ ही भारत और चीन के लिए समस्या खड़ी कर दी है। कहानी तो उसी समय बदल गई थी जब अमेरिकी राष्ट्रपति 2 माह पूर्व घोषणा की थी कि उनका देश ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से बाहर निकल रहा है। मकसद इतना था कि पूर्णतया तो नहीं लेकिन आंशिक रूप से उसके निर्यात को प्रभावित कर सकता है, ईरान लगभग प्रतिदिन 2200000 बैरल कच्चे तेल का उत्पादन करता है जिसमें से वह रोजाना 2000000 निर्यात करता है। अमेरिका की इन हरकतों की वजह से सऊदी अरब को अब तवज्जो मिलेगा जो कि अमेरिका का सहयोगी है।
ईरान से कच्चा तेल का आयात करने के मामले में भारत और चीन प्रमुख हैं, करीब आधा तेल खरीदते हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमत भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों और भारत सरकार के बजट गुणा भाग को प्रभावित करेंगी । अभी भारत अपनी आवश्यकता का 80% से अधिक तेल आयात करता है। अगर वैश्विक बाजार में इसकी कीमतें बढ़ी तो व्यापार घाटा बढ़ना तय है चालू खाते के घाटे की भरपाई शायद ही कर सके। इसके लिए विदेशी मुद्रा भंडार को खर्च करने की जरूरत होगी जिससे पहले से ही दबाव में चल रही रुपए डॉलर की विनिमय दर यानी एक्सचेंज रेट और बढ़ेगी। इसके अलावा तेल की बढ़ी कीमतें मुद्रास्फीति यानी महंगाई पर भी असर डालेंगी , और बढ़ी हुई LPG व केरोसिन तेल सब्सिडी बिल से पार पाना सरकार के लिए खासा मुश्किल हो जाएगा।
उपाय:-
हमें आकस्मिक योजना भी बनानी होगी। गैर मौद्रिक कारोबार यानी वस्तुओं के आदान प्रदान वाली व्यवस्था बतौर विकल्प अपनाई जा सकती हैं। इस रणनीति में हमें आयात प्रबंधन पर खासा जोर देना होगा। साथ ही व्यापार घाटे में वृद्धि को रोकने के लिए निर्यात बढ़ाने संबंधी उपायों पर भी अमल करने की जरूरत है। सिंचाई पंपों के लिए सौर ऊर्जा को प्राथमिकता दी जाए।