यह चंद्रगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी बना। इसके बारे में जानकारी प्रयाग प्रशस्ति से मिलती है । प्रयाग प्रशस्ति समुद्रगुप्त के मंत्री हरिषेण के द्वारा बनवाया गया था। इसमें कुल 24 पंक्तियां उत्कीर्ण हैं। जिससे समुद्रगुप्त की विजय अभियानों की जानकारी मिलती है। यह प्रशस्ति संस्कृत भाषा में खुदवायी गई थी। प्रयाग प्रशस्ति के आधार पर समुद्रगुप्त के अभियानों का विवरण -
आर्यावर्त का विजय-
यह राज्य उत्तर भारत में फैला था। जहां पर समुद्रगुप्त ने दो युद्ध लड़े। एक युद्ध में इसने 9 राजाओं को पराजित किया तथा दूसरे युद्ध में इसने 3 राजाओं को पराजित किया इस तरह इसने आर्यावर्त में कुल 12 राजाओं को पराजित किया। इसने आर्यावर्त के राजाओं के साथ प्रमोद्धकरण की नीति अपनाई, जिसका अर्थ होता है कि राज्यों को जीतकर राजाओं को पूर्ण रूप से नष्ट कर देना। प्रयाग प्रशस्ति के 13 और 14 में पंक्ति में आर्यावर्त के प्रथम युद्ध का वर्णन है । जबकि तीसरी पंक्ति में आर्यावर्त के दूसरे युद्ध के बारे में वर्णन किया गया है।
दक्षिणापथ का विजय-
प्रयाग प्रशस्ति की 19वीं और 20वीं पंक्ति में दक्षिणापथ विजय के बारे में जानकारी मिलती है। इस युद्ध में समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत के 12 राजाओं को पराजित किया। समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत के साथ ग्रहणमोक्षानुग्रह नीति अपनाई अर्थात विजय के बाद उनका राज्य वापस कर दिया गया।
इतिहासकार राय चौधरी ने इसे धर्म विजय की संज्ञा प्रदान किया है।