भारत में उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम 2014 को सर्वोच्च न्यायालय की पांच जजों की पीठ ने 4: 1 अनुपात के बहुमत से असंवैधानिक घोषित कर दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने इसे न्यायपालिका के कामकाज में कार्यपालिका का हस्तक्षेप माना है। न्यायालय ने कहा कि जजों की नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका से साझा करना चुनौतीपूर्ण है। न्यायपालिका से नागरिक अधिकारों को सुनिश्चित किए जाने की अपेक्षाओं को केवल तभी पूरा किया जा सकता है जब न्यायपालिका सरकार के अन्य अंगों से पूरी तरह हस्तक्षेप विहीन और स्वतंत्र हो।
इस निर्णय से असंतुष्ट विशेषज्ञों का मत है कि यह निर्णय समुचित रुप से विवाद के मूल प्रश्न "उच्चतर न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति का अधिकार केवल न्यायालयों को ही होना किस प्रकार से संविधान के मूलभूत ढांचे का भाग है ?" का उत्तर देने में असफल रहा है।
विशेषज्ञों का तर्क है कि यह अधिनियम कॉलेजियम व्यवस्था की कमियों को दूर करने तथा एक पारदर्शी एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्माण का प्रयास था, जबकि न्यायालय का यह निर्णय परोक्ष रूप से एक ऐसी संविधानेत्तर व्यवस्था को बढ़ावा देता है जिसमें संसद द्वारा निर्मित व्यवस्था के स्थान पर न्यायालय अपने सदस्यों के माध्यम से अपने कार्यों को करता है।
गौरतलब है कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को देश की सर्वोच्च लोक तांत्रिक संस्था संसद द्वारा अधिनियमित किया गया था जिसमें 20 राज्य सरकारों का समर्थन भी शामिल था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने माना की कॉलेजियम व्यवस्था में कमियां मौजूद है ,लेकिन फिर भी शीर्ष अदालत ने मामले को बड़ी बैच के पास भेजने की अर्जी को अस्वीकार कर दिया।