समुद्र गुप्त ( 335 ई. - 375 ई. ) ( Part- 03 )

विदेशी शक्तियों से संबंध-

प्रयाग प्रशस्ति के 23वीं, 24वी पंक्ति में कुछ विदेशी शक्तियों के नाम दिए गए हैं।

देवपुत्र, शक, मुरुंड, सिंहल इत्यादि दीपों के बारे में जानकारी मिलती है।

देवपुत्र- 

देवपुत्र कुषाणों की उपाधि थी। इस समय पेशावर के आसपास कुषाण राजा केदार शासन करता था। विदेशी शक्तियों के साथ गरुण मण्डन प्रशासन की बात करता है।जिसका शाब्दिक अर्थ गुप्तों के राजकीय चिन्ह गरुड़ को विदेशी शक्तियां अपने मुद्रा, ध्वज पर अंकित करवाये।

 शक-

 इस समय के लोग मालवा, गुजरात और काठियावाड़ क्षेत्र में शासन करते थे। इस समय समुद्रगुप्त का समकालीन शक राजा रुद्र सिंह तृतीय था।

मुरुंड-

इसकी पहचान संदिग्ध है।

सिहल (श्री लंका )-

समुद्रगुप्त के समकालीन श्री लंका का राजा मेघवर्मन था। इसने बोध गया में बौद्ध विहार बनवाने की आज्ञा मांगी थी तथा समुद्रगुप्त के पास अपना राजदूत भेजा था तथा आगे चलकर यह प्रसिद्ध बौद्ध विहार के रूप में विकसित हुआ। समुद्रगुप्त ने अपना प्रभुत्व दक्षिण पूर्व एशिया में स्थापित किया था। दक्षिण पूर्व एशिया के कंबोडिया में अंकोरवाट का मंदिर स्थित है। जो विश्व का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि इसको बनवाने का कार्य समुद्रगुप्त के वंशज ईश्वर पाल ने किया था। इतिहासकार विन्सेफ स्मिथ या वी ए स्मिथ ने समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा है।

समुद्र गुप्त के सिक्के- 

समुद्रगुप्त के सिक्कों पर उसकी पत्नी दत्त देवी और उसकी आकृति अंकित मिलती है।समुद्रगुप्त को वीणा बजाते हुए सिक्कों पर दिखाया गया है तथा उसे कविराज की उपाधि से विभूषित किया गया है। भारत का सबसे प्राचीन वाद्य यंत्र वीणा है। समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था। जिस बात की जानकारी सिक्कों से मिलती है। एक तरफ घोड़ा और एक तरफ यज्ञ की आकृति मिलती है। समुद्रगुप्त ने फरसा लिए हुए एक सिक्का जारी किया जो उसका राजाओं के ऊपर विजय का सूचक है। बौद्ध विद्वान/आचार्य वसुबंधु समुद्रगुप्त के दरबार में निवास करते थे। इसने कविराज की उपाधि धारण किया था।

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