चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' ( 375 ई. - 415 ई. )

इसके अन्य नाम देवराज या देव गुप्त थे। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के शासनकाल को गुप्त काल का स्वर्ण काल कहा जाता है। ऐतिहासिक स्रोत से जानकारी मिलती है कि इसके  शासन से पहले इसके बड़े भाई रामगुप्त ने शासन किया था।

रामगुप्त की ऐतिहासिकता-

चंद्रगुप्त और समुद्रगुप्त के बीच में कुछ समय के लिए राम गुप्त शासक बना था। इस बात की जानकारी निम्न स्रोतों से मिलती है जैसे देवीचंद्रगुप्तम, काव्यमीमांसा इत्यादि। 1983 ईस्वी में बीएचयू के नंदी हाल में इस ऐतिहासिक स्रोत पर बैठक हुई जिसमें राम गुप्त की ऐतिहासिकता स्वीकार की गई।

चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के वैवाहिक संबंध-

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय ने वैवाहिक संबंधों और विजयों के द्वारा अपने साम्राज्य की सीमा बढ़ाई तथा तीन राजवंशो में अपना वैवाहिक संबंध स्थापित किया।

नागवंश, वाकाटक वंश और कदंब वंश

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय के विजय अभियान-

महरौली लौह स्तंभ से चंद्र नामक शासक की विजय का उल्लेख मिलता है। मेहरौली लौह स्तम्भ दक्षिणी दिल्ली में स्थित है। इतिहासकारों द्वारा चंद्र नामक राजा की पहचान चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय से किया गया है। चंद्रगुप्त द्वितीय ने उज्जैनी के अंतिम शासक रुद्र सिंह तृतीय को 409 ईसवी में पराजित किया था तथा इसी विजय के उपलक्ष में 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण किया था और व्याघ्र शैली का सिक्का चलवाया था। उत्तर भारत में सर्वप्रथम लेखयुक्त चांदी का सिक्का चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के द्वारा चलाया गया था। इन सिक्कों पर विक्रमादित्य की उपाधि मिलती है।

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय के दरबार के नवरत्न -

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में नवरत्नों की एक मंडली निवास करती थी। जिसे नवरत्न कहा गया है ।

कालिदास, धनवंतरी, वराह मिहिर, अमर सिंह, क्षपणक, शंकु, बेतालभट्ट, घटकर्पर, पररूचि जैसे विद्वान मौजूद थे।

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय के दरबार में फाह्यान नामक चीनी यात्री भारत आया था। इसने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक सभी पक्षों का वर्णन किया है तथा इसने कहीं पर भी राजा के नामों का उल्लेख नहीं कियाहै। यह 399 ईस्वी से 414 ईसवी तक 15 साल भारत में रहा है। यह भारत आने वाला पहला चीनी यात्री था।

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय के सिक्के- 

चंद्रगुप्त ने स्वर्ण, रजत और ताम्र मुद्रा जारी किया। इसके स्वर्ण सिक्कों को दीनार कहा जाता था। दीनार शब्द लैटिन भाषा का शब्द है। चांदी के सिक्के को रूपक या रूपयक कहा जाता था।

धनुर्धारी प्रकार के सिक्के-

इस प्रकार के सिक्के सर्वाधिक संख्या में मिलते हैं। इन सिक्कों पर एक तरफ धनुष बाण के लिए हुए राजा की मूर्ति तथा दूसरी तरफ गरुड़ध्वज पर बैठी हुई लक्ष्मी जी को दिखाया गया है।

छत्रधारी प्रकार का सिक्का-

इन सिक्कों के मुख पर आहुति डालता हुआ राजा खड़ा है वह अपना बाया हाथ तलवार मुठ्ठियों रखे हुए है और राजा के पीछे एक बौना नौौकर छत्र ताने खड़ा है। इस बात से यह जानकारी मिलती है कि विक्रमादित्य उत्तम कार्यो द्वारा स्वर्ग को भी जीतता है।

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