अशोक के स्तंभों का न केवल राजनीतिक एवं धार्मिक महत्व है बल्कि कलात्मकता में भी वे विशिष्ट हैं ।

इतिहास साक्ष्य आधारित होता है। मौर्यकालीन इतिहास जानने में अशोक के स्तंभ लेख काफी महत्वपूर्ण है ।50 से अधिक की संख्या में पाए गए शिलालेखों से मौर्य कालीन राजनीतिक ,धार्मिक ,आर्थिक ,और सामाजिक व्यवस्था का भी ज्ञान होता है। दरअसल देश के विभिन्न हिस्सों में लगवाए गए इन शिलालेखों के जरिए सम्राट अशोक ने अनेक प्रशासनिक और धार्मिक आदेश जारी किए थे ।इसलिए अशोक के स्तंभों की राजनीतिक एवं धार्मिक महत्ता  असंदिग्ध है किंतु यह अपने कलात्मकता में ही विशिष्ट हैं।

      अशोक कालीन कला के सर्वोत्कृष्ट नमूने एक ही ठोस पत्थर के बने स्तंभों में पाए जाते हैं, जिन पर उनके आदेश खुदे हुए हैं ।प्रत्येक स्तंभ में एक मूठ या खंभा है जो पत्थर के एक ही टुकड़े से बनाया गया था। यह एक ही प्रस्तर खंड के बने शीर्ष भाग को अपने ऊपर रखता था। गोल और कुछ पतली होती जाती मूठ जो बालू के मिले पत्थर से निर्मित है, बहुत ही चिकनी और अपने अनुपात में सुंदर है। शीर्ष भाग भी उतना ही अधिक चिकना है और परिधि में एक या अधिक पशुओं की मूर्तियां हैं जो एक खंबे पर टिकी हैं ।इसके नीचे उल्टा कमल है जिसे' Percy police का घंटा' कहा जाता है ।समझा जा सकता है कि पत्थर के इन विशाल टुकड़ों को काटने में ,पत्थर निकालने की खानों से सैकड़ों मील दूर हटाने में, और कभी-कभी पहाड़ की चोटी तक ले जाने में इंजीनियरिंग का बहुत उच्च ज्ञान प्रदर्शित किया गया था। इन स्तंभों की चमक देखने पर ज्ञात होता है कि पत्थर को काटने और छीलने तथा संपूर्ण सतह पर चमकीला रंग देने में असाधारण शिल्प कला विज्ञान संबंधी कौशल दिखाया गया था ।मौर्यकालीन कला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण सारनाथ का स्तंभ तथा दीदारगंज यक्षिणी मूर्ति है। अपनी कलात्मक महत्ता के कारण ही सारनाथ के स्तंभ का 'चार सिंघ' हमारा राष्ट्रीय चिन्ह है ।

   कहने का तात्पर्य यह है कि अशोक के स्तंभों की धार्मिक एवं राजनीतिक महत्व के साथ-साथ उनकी कलात्मक विशेषता भी है ।

Posted on by