दक्षिण पश्चिम मानसून की क्रियाविधि।

भारत में जून से सितंबर के मध्य दक्षिण -पश्चिम मानसून पवन के द्वारा मानसूनी वर्षा होती है। यह पवन प्रायद्वीपीय भारत के दक्षिणी छोर से टकराने के बाद दो मुख्य शाखाओं, अरब सागर शाखा और बंगाल की खाड़ी की शाखा में विभाजित हो जाती है।

आगे अरब सागर की शाखा पुनः 3 उप शाखाओं में विभाजित होकर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवेश करती है। इसकी पहली उपशाखा पश्चिमी घाट के समुद्र वर्ती ढाल से टकराने के बाद पर्वतीय वर्षा करते हुए प्रायद्वीपीय भारत में प्रवेश करती है जहां इसकी दिशा पश्चिम से पूर्व की ओर होती है।

वहीं इसकी दूसरी उपशाखा नर्मदा ताप्ती नदी घाटी से होते हुए छोटा नागपुर पठार की ओर जाती है जबकि तीसरी और अंतिम उपशाखा गुजरात के तटीय मैदान से प्रवेश करने के बाद पंजाब हरियाणा के मैदान की ओर जाती है जहां इसकी दिशा अरावली पर्वत के समानांतर होती है।

दूसरी तरफ बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करने वाली मानसून पवन की दिशा कोरोमंडल तट के समानांतर होती है।

इन पवन की पहली उपशाखा पूर्वी तटीय मैदान से प्रवेश करने के बाद मध्य भारत और उत्तरी मैदान से होते हुए पंजाब हरियाणा के मैदान की ओर जाती है जबकि इसी पवन की दूसरी उपशाखा उत्तर पूर्वी भारत के पर्वतीय क्षेत्र से टकराने के बाद पर्वतीय वर्षा कर आते हुए सुदूर उत्तर पूर्व की ओर जाती है जो हिमालय पर्वत के सिंतेक्सियाल मोड से टकराने के बाद पश्चिम की ओर मुड़ जाती है।

इस प्रकार उत्तर भारत के पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों में बंगाल की खाड़ी की शाखा से होने वाली वर्षा की मात्रा में पूर्व से पश्चिम की ओर जाने पर क्रमशा कमी आती है जबकि प्रायद्वीपीय भारत में अरब सागर की शाखा के द्वारा होने वाली वर्षा की मात्रा में पश्चिम से पूर्व की ओर जाने पर कमी आती है।

यही कारण है कि पश्चिमी घाट के तटवर्ती ढाल और उत्तर पूर्वी भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में औसत से अधिक वर्षा होती है वही पश्चिमी भारत और प्रायद्वीपीय भारत के आंतरिक क्षेत्रों में मानसूनी पवन के सुस्त हो जाने के कारण वर्षा अत्यंत नगन्य मात्रा में होती है जबकि अरावली पर्वतीय क्षेत्रों और तमिलनाडु के कोरोमंडल तटीय क्षेत्रों में मानसूनी पवन के समानांतर प्रवाह के कारण ग्रींष्म ऋतु के समय मानसूनी वर्षा नहीं होती है।

इस प्रकार दक्षिण पश्चिम मानसून पवनों के द्वारा समस्त भारत में वर्षा का वितरण एक समान नहीं है।

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