अलीगढ़ आंदोलन

1857 का विद्रोह वह विभाजक रेखा है, जोजो आधुनिक युग के पूर्व के रूढ़िवादी आंदोलन को आधुनिक कालीन आधुनिकतावादी सुधारवादी और पारंपरिक आंदोलन से पृथक करती है। इस विद्रोह ने उत्तर भारत के मुसलमानों की स्थिति कोचीन को छिन्न-भिन्न कर दिया। मुसलमानों का अंग्रेजो के साथ संघर्ष उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत से लेकर बंगाल तक हर मोर्चे पर असफल है। अब पाश्चात प्रभुत्व एवं पाश्चात्य बौद्धिक के दृष्टिकोण के साथ समायोजन की आवश्यकता अनुभव करते हुए समिति राजनीति का दृष्टिकोण में परिवर्तन आवश्यक हो गया। ऐसा समय ही मुस्लिम भारत के अन्यतम महापुरुष सर सदैव अहमद खान का अवतरण हुआ। इन्होंने स्पष्ट दृष्टि तथा असाधारण दृढ़ संकल्प के साथ रूढ़िवादी उलेमाओं के खुले विरोध और अपने कुछ घनिष्ठ मित्रों एवं साथियों के परोक्ष उपहास के समान रूप से अवहेलना करते हुए सुधार की दिशा में अपने भागीरथ प्रयत्न प्रारंभ किए।

1857 के विद्रोह के समय वह कंपनी की न्यायिक सेवा मे थे और सरकार के प्रति सदैव निष्ठावान रहे हैं। सेवानिवृत्ती के बाद वह सामाजिक धार्मिक सुधार की भूमिका में आगे आए। 1870 मैं प्रारंभ किए गए तहजीब उल अख़लाक़ के प्रकाशित उनके लेख तथा अन्य रचनाओं से उनके विचारों के स्पष्टस्पष्ट बौध्दिक एवं प्रगतिशील स्वरूप का परिचय मिलता है।

बल्कि उन्होंने हिंदू मुसलमानों के राजनीतिक सहयोग का पक्ष प्रस्तुत करते हुए मुसलमानों के व्यक्तिगत रूप से सामूहिक सुधार का प्रयास किया। उनका मत था कि आधुनिक शिक्षा उसका ताकृक दृष्टिकोण तथा वैज्ञानिक विधियां मुस्लिम मानस को सुधारने में उपयोगी हो सकता है । वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि केवल पाश्चात्य शिक्षा पाकर ही मुस्लिम समुदाय पिछड़ेपन से मुक्त होकर आगे बढ़ सकता है तथा अपने शासकों के साथ समझोता कर सकता है। उन्होंनेउन्होंने मुस्लिम बहुल अलीगढ़ नगर को अपने गतिविधियों का केंद्र बनाया जिसके कारण सर सैयद की गतिविधियां अलीगढ़ आंदोलन के रूप में प्रसिद्ध हैं

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