इसके समय में मध्य एशिया के हूणों ने आक्रमण किया था। जिसे पराजित करने का कार्य स्कंद गुप्त ने किया था। स्कंद गुप्त की सफलता का उल्लेख जूनागढ़ अभिलेख तथा गाजीपुर के भीतरी स्तंभ अभिलेख से मिलता है। स्कन्दगुप्त के शासन काल में गुजरात के सुदर्शन झील में दरारें पड़ गई थी जिसे पुनः निर्माण का काम स्कंद गुप्त ने किया था। वहां पर अपना राज्यपाल पणदत्त को नियुक्त किया। स्कंद गुप्त ने 466-67 ईस्वी में चीन में अपना एक दूध मंडल भेजा था तथा चीन के साथ मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित किया था। उस समय चीन का राजा सांग था। स्कंद गुप्त के शासनकाल में मिलावट की मात्रा देखी जाती है जो यह प्रदर्शित करती है कि गुप्त वंश पतन की ओर अग्रसर हो चुका था। स्कंद गुप्त के शासनकाल में पंजाब, सिंध, अफगानिस्तान क्षेत्र हूणों के अधिकार में चला गया।
स्कंद गुप्त के सिक्के-
स्कंद गुप्त नेे बैैल की आकृति युक्त सोने का सिक्का जारी किया था।
स्कंद गुप्त के अभिलेख-
जूनागढ़ अभिलेख-
यह गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है इसके द्वारा हूणों की पराजय की जानकारी मिलती है ।इस अभिलेख से स्कंद गुप्ता के द्वारा सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण की जानकारी मिलती है। इस अभिलेख से जानकारी मिलती है कि पणदत्त को गुजरात क्षेत्र में राज्यपाल नियुक्त किया गया था। यह संस्कृत भाषा में लिखा गया महत्वपूर्ण लेख है।
इंदौर ताम्र पत्र लेख-
यह अभिलेख उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिला में स्थित है इस अभिलेख में सूर्य की पूजा तथा सूर्य मंदिर में दीपक जलाए जाने का, धन दान किए जाने का विवरण मिलता है।
भीतरी स्तंभ लेख-
यह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिला में स्थित है इस अभिलेख से पुष्यमित्र तथा हूण नामक विदेशी जातियों के आक्रमण की जानकारी मिलती है तथा इन दोनों जातियों को इसने पराजित किया था। यह संस्कृत भाषा में लिखा गया महत्वपूर्ण अभिलेख है। इस अभिलेख से यह जानकारी मिलती है कि पुष्यमित्र और हूंण नामक जाति को गंगा घाटी या गंगा ध्वनि में पराजित किया था।
कहौम स्तंभ लेख-
यह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिला में स्थित है इस अभिलेख से यह पता चलता है कि भद्र नामक व्यक्ति ने पांच जैन तीर्थंकरो जैसे-आदिनाथ, शांतिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी के प्रतिमाओं का निर्माण करवाया।
सुपिया लेख-
यह MP के रीवा जिला में स्थित है इस लेख से गुप्तों की वंशावली घटोत्कच से गुप्त वंश की जानकारी मिलती है।
गढ़वा शिलालेख-
यह अभिलेख इलाहाबाद के करछना तहसील में स्थित है यह स्कंद गुप्त के शासन का अंतिम अभिलेख है गुप्त वंश का पतन स्कंद गुप्त के शासन काल से प्रारंभ हुआ।
स्कंद गुप्त के उत्तराधिकारी-
पुरू गुप्त (467 ईसवी से 473 ईसवी तक)
इसने वैष्णव धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म को अपना लिया था।
बुद्धगुप्त (476 ईस्वी से 495 ईसवी तक)
ह्वेनसांग के अनुसार यह भी बौद्ध धर्म का अनुयायी था। इसने नालंदा विश्वविद्यालय को धन दान में दिया था।
नरसिंह गुप्त 'बालादित्य' (495 ईसवी से 510 ईसवी तक)
यह भी बौद्ध धर्म का अनुयाई था इसने हूणों के शासक मिहिर कुल को पराजित किया था तथा उन्हें बंदी बना कर जेल में डाल दिया था लेकिन माता के कहने पर उसने इसे छोड़ दिया था।
भानुगुप्त (510 ईस्वी से 520 ईसवी तक)
इसके शासनकाल में एरण अभिलेख से सती प्रथा की जानकारी मिलती है। यह सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य है। इस अभिलेख भानू गुप्त के मित्र और सेनापति गोपाल, भानुभक्त की ओर से लड़ता हुआ हूणों के हाथों मारा गया और उसकी पत्नी उसके साथ जलकर मर गई।
गुप्तों का अंतिम शासक विष्णुगुप्त हुआ।