चंद्रगुप्त मौर्य

चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरु चाणक्य की सहायता से मगध के शासक धनानंद का वध करके मगध पर अधिकार कर लिया था। चंद्रगुप्त कौन था एवं किस वंश का था इस विषय में विद्वानों के पर्याप्त मतभेद हैं। ब्राह्मण ग्रंथ उसे सुद्र बताते हैं। मुद्राराक्षस में उसके  लिए कुलहिन शब्द आए हैं। डॉक्टर आर के मुखर्जी के अनुसार वाह छत्रिय कुल का था, परंतु जिस समय उसका जन्म हुआ था उसकेउसके वंश की दशा अच्छे नहीं थी। इसइस विचार के लिए आर के मुखर्जी ने जस्टिन के शब्दों का उल्लेख किया है के अतः कुलहिन से तात्पर्य संपन्न है शूद्र से नहीं। अर्थशास्त्र से चंद्रगुप्त मौर्य के क्षत्रिय होने के संकेत मिलते हैं। विदेशी स्रोतों के आधार पर भी चंद्रगुप्त को शूद्र नहीं कहा जा सकता है। बौद्ध साहित्य महावंश दिव्यावदान के ग्रंथ परिशिष्ट के समर्थन में हरिभद्र टीका मैं चंद्रगुप्त को मयूर पोशाकों के सरदार का चित्र बताया गया है।

मयूर के आधार पर ही इस वंश का नाम मौर्य पड़ा।डॉक्टर रोमिला थापर ने उसे वैश्य वर्ण का माना है। चंद्रगुप्त  मौर्य की संज्ञा का प्राचीनतम अभिलेखीय साक्षी रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख से मिलता है।

नंद वंश का अंत कर के वह अपने साम्राज्य का दूर तक विस्तार करके चंद्रगुप्त ने इतने बड़े साम्राज्य की स्थापना की कि उसे ही भारतीय साम्राज्य का पहला ऐतिहासिक संस्थापक माना जाता है। सर्वप्रथम उसने मगध पर सीधा आक्रमण किया, मगर असफल रहा। इस असफलता से प्रेरणा लेकर पहले उसने पंजाब पर और फिर मगध पर अधिकार किया। मगध की केंद्रीय सत्ता हाथ में लेने के बाद उसने 305 ईसवी पूर्व में सेल्यूकस को पराजित को पराजित किया। सेल्यूकस को उससे संधि करनी पड़ी।

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