पल्लव राज्य कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण था। इस काल में साहित्य का बहुत विकास हुआ। पल्लव राजा विद्वानों के महान संरक्षक थे। दंडी ,नरसिंह वर्मन द्वितीय का राजकवि था। संस्कृत साहित्य का इस काल में बहुत विकास हुआ। कांची संस्कृत ज्ञान का केंद्र था। कालिदास, भारवी और वराहमिहिर की कृतियां देश में सर्वविदित है। तमिल भाषा की उत्कृष्ट कृतियों को भी राज राज संरक्षण दिया गया।
आठवीं शताब्दी में भारत पर छा जाने वाला महान धार्मिक सुधारों का जन्म पल्लव राज्य में ही हुआ। तमिल के वैष्णव और शैव साहित्य का विकास मुख्यता इसी युग में हुआ। जैन और बौद्ध आचार्यों का अधिकार धीरे-धीरे क्षीण हो गया। पल्लवों के अनुदानों से ज्ञात होता है कि इस युग में दक्षिण का आर्थिक कारण संपूर्ण हुआ। न्याय भाष्य का लेखन वात्स्यायन कांची का पंडित था। भिंड नाग तथा कदंब वंश मयूर वर्मा ने कांची विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। पल्लव महान समुद्री शक्ति थे। समुद्री यात्राएं मुख्यता भारत मलाया और इंडोनेशिया में भारतीय राज्यों के साथ मैत्रीमैत्रीपूर्ण संबंध रखने के लिए की जाती थी।
प्रोसेसर पर्सी ब्राउन का मत है कि दक्षिण भारत की वास्तुकला पर सबसे अधिक प्रभाव पल्लवों का था तथा उनके निर्माण कार्य द्रविड़ शैली का आधार बने। पल्लवों की पहली
भवननिर्माण कला को दो भागों में बांटा जा सकता है-चट्टान काटकर बनाए गए हैं तथा निर्मित चट्टानी मंदिरों को पुनः दो श्रेणियों में रखा जा सकता है। खुदे हुए स्तंभों से युक्त मंडप तथा एक ही पत्थर को काटकर बनाया गया रथ नामक पवित्र स्थान। नरसिंह वर्मा द्वितीय राज सिंह ने मंदिरों में पत्थर की जगह ईटो और लकड़ी का प्रयोग किया। दक्षिण मैं पल्लवों ने ही मंदिर निर्माण प्रथा का आरंभ किया था।
पल्लव शिल्प कथा का विभिन्न शैलियों से नियमित विकास हुआ। इनमें प्रथम महेंद्र शैली 600 इसवी सेसे 625 ईसवी तक प्रचलित रही। तीसरी शैली राज सिंह सैनी तथा चौथी शैली 900 ईस्वी की अपराजिता से ली थी। प्रोसेसर के नीलकंठ शास्त्री का मत है कि पल्लवों का दक्षिण भारत की कला में महान देना।