> काकतीय वंश का संस्थापक "बीटा प्रथम" था, जिसने नलगोंडा (हैदराबाद) में एक छोटे से राज्य का गठन किया, जिसकी राजधानी अंमकोंड थी।
> इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक गणपति था।रुद्रमादेवी गणपति की बेटी थी, जिसने रुद्रदेव महाराज का नाम ग्रहण किया, महाराज रुद्रदेव ने 35 वर्ष तक शासन किया।
> वेनिस के यात्री मार्को पोलो ने रुद्रम्मा की बड़ी सराहना की है।
> गणपति ने अपनी राजधानी वारंगल में स्थानांतरित कर ली थी ।
> इस राज वंश का अंतिम शासक प्रताप रुद्र (1295-1323 ई०) था ।
> सबसे पहले कोहिनूर काकतीय राजाओं के पास ही था ।
> काकतीय वंश के शासक -
- यर्रय्या या बेतराज प्रथम- (1000 से 1050 ई०)
- प्रोलराज प्रथम- (1050 से 1080 ई०)
- बेतराज द्वितीय- (1080 से 1115 ई०)
- प्रोलराज द्वितीय- (1115 से 1158 ई०)
- रुद्रदेव या प्रतापरुद्र प्रथम- ( 1158 से 1197 ई०)
- रुद्रम्मा- (1261 से 1296 ई०)
- प्रतापरुद्र द्वितीय- (1296 से 1323 ई०) > वारंगल् दुर्ग, तेलंगण के वरंगल में स्थित एक दुर्ग है। इसका निर्माण 1399 ई० में हुआ था। काकतीय वंश के गजपति देव तथा उनकी पुत्री रुद्रम्मा ने इस विशाल दुर्ग का निर्माण कराया था।। > गणपति के बाद उसकी पुत्री रुद्रमा देवी वारंगल की शासिका बनी। रुद्रमा देवी का उत्तराधिकारी उसका पुत्र 'प्रतापरुद्र देव' था। इसी के काल में ख़िलजी एवं तुग़लक़ शासकों ने वारंगल पर आक्रमण किया। चौदहवीं सदी के प्रारम्भ में जब अफ़ग़ान सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलज़ी का प्रसिद्ध सेनापति मलिक काफ़ूर दक्षिण भारत की विजय के लिए निकला, तो देवगिरि के यादवों और द्वारसमुद्र के होयसलों के समान वारंगल के काकतीयों की भी उसने विजय की। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ के पुत्र 'उलगू ख़ाँ' (मुहम्मद बिन तुग़लक़) ने 1332 ई. में वारंगल पर आक्रमण कर प्रतापरुद्र देव को बंदी बना लिया। इसके बाद काकातीय साम्राज्य को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया।