जिन सिक्कों पर छिन लगाए जाते हैं उनको आहत सिक्के कहते हैं । ऐसे आहत सिक्के ही प्राचीन काल के मुख्य सिक्के हैं भारत के राष्ट्रीय सिक्के को ही पढ़ कहते हैं ।
आहत सिक्के धातु के टुकङे पर चिन्ह विशेष ठप्पा मारकर (पीटकर) बनाए जाते थे। आहत सिक्कों पर चिन्हों के अवशेष भी मिलते हैं जैसे – मछली, पेङ, मोर, यज्ञ वेदी, हाथी, शंख, बैल, ज्यामीतीय चित्र (वृत्त, चतुर्भुज, त्रिकोण ), खरगोश।
इन सिक्कों का कोई नियमित आकार नहीं था। ये राजाओं द्वारा जारी नहीं किए गए माने जाते हैं , बल्कि व्यापारिक समूहों से संबंधित माने गए हैं।अधिकांश आहत सिक्के पूर्वी यू.पी.(इलाहाबाद, शाहपुरा) तथा बिहार(मगध) से मिले हैं।सबसे पहले पिघली चाँदी की एक पतली चादर बना ली जाती थी, और फिर इस चादर से अंदाज़े से बराबर तौल या वजन के टुकड़े काट लिए जाते थे ।परन्तु ढाले गए ये चादर सब जगह समान नहीं होते थे, इसलिए सभी सिक्कों का वजन बराबर करने के लिए ज्यादा भारी सिक्कों के कोने काट लिए जाते थे। इस कारण ये सिक्के अनियमित आकार तथा आकृतियों के होते थे।
एक बराबर वजन के सिक्के काट लेने के बाद उन पर ठप्पे से कुछ विशेष चिन्ह बनाये जाते थे ।इस कार्य के लिए पहले से बने ठप्पे को चाँदी के इन टुकड़ों पर रखकर उस पर हथोड़े या भरी चीज से चोट की जाती थी, जिससे ठप्पे का चिन्ह चाँदी के इन टुकड़ों पर बन जाते थे। चूँकि इन सिक्कों को ठप्पे पर चोट करके बनाये जाते थे, इसलिए अंग्रेज विद्वानों ने इसे पंचमार्क सिक्के (आहत सिक्के) का नाम दिया ।
मौर्य काल में पंच-मार्क वाले ये सिक्के बहुतायत में चलन में आये. इसी काल में ताम्बे के इन सिक्कों का चलन भी प्रारंभ हुआ. मगध राज में शुरू हुयी यह परंपरा इस समय अपने चरम पर रही. इन पंचमार्क सिक्कों पर अब तक ४५० से ज्यादा चिन्ह पहचाने जा चुके हैं जिनमे सूर्य, छः हाथों वाले प्रतिक, विभिन्न ज्यामितीय आकृतियाँ, चक्के, मानव आकृतिया, जानवर, धनुष-बाण, पर्वत, पेड़ आदि की प्रचुरता है. कुछ निशान अस्पष्ट भी हैं. कलात्मक चिन्हों वाले इन सिक्कों का भारतीय इतिहास के अध्ययन में बहुत महत्त्व है ।