सूफीवाद इस्लाम धर्म के धार्मिक जीवन की वह अवस्था है ।जिसमें वह क्रियाओं के अपेक्षा आंतरिक क्रियाओं पर अधिक बल दिया जाता है। इसी कारण इसे तसब्बुफवाद कहा जाता है। यह एक इस्लामी रहस्यवाद का बोधक होता है। सूफी शब्द की उत्पत्ति ऊँन शब्द से हुई है। क्योंकि सूफी लोग ऊनी वस्त्र को धारण करते हैं ।सूफी संप्रदाय के लोग ऊनी वस्त्र या कंबल धारण करते थे ।इनकी उत्पत्ति पैगंबर साहब के सहयोगी के रुप में हुई जो लोग सांसारिक जीवन का परित्याग कर ईश्वर की तपस्या में लीन हो गए थे ।पैगंबर मोहम्मद साहब के कुछ सहयोगी मदीना के मस्जिद में निर्धनता आत्म संताप का जीवन व्यतीत करते थे। तथा समाज और संगीत के माध्यम से ईश्वर को पसंद करते थे।
ख्वाजा मंसूर में सूफी परंपरा को अमर बनाने का काम किया हुआ है। स्वयं बगदाद की सड़कों पर अन हलक हो का नारा लगाया करते थे। अन हलक का शाब्दिक अर्थ होता है मैं खुदा हूं ।जहां जहां मुस्लिम सेना जाती थी उसके पीछे मुस्लिम संत भी जाया करते थे। जिसके कारण उसे मृत्युदंड दिया गया जब मंसूर का सिर धड़ से अलग किया गया तो उसके रक्त के प्रत्येक बूंद से अन हलक अन हलक की ध्वनि सुनाई दी।
सूफी परंपरा में ईश्वर को प्रेमी और अपने को प्रिय आत्मा माना जाता है। सूफी परंपरा के महान संत का गजाली हुए। जिन्होंने सूफीवाद को नया जीवन दिया मोहम्मद गजाली को हुज्जत उल इस्लाम कहा जाता था।