महात्मा गांधी -2( दक्षिण अफ्रीका)

यह अहिंसा की पहली जीत थी – सविनय अवज्ञा की पहली जीत। इसने पूरी दुनिया के समक्ष पहली बार यह साबित कर दिया कि अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए हिंसा का रास्‍ता अख्तियार करना एक अप्रचलित या पुरातन तरीका है।

जब भी किसी बिगड़ते हालात से पूरे विश्वास के साथ, साहस के साथ, दृढ़ता के साथ एवं धीरज के साथ निपटा जाता है तो अहिंसा की तुलना में कोई भी हथियार अधिक कारगर साबित नहीं होता है। यह धरसना नमक वर्क्स और भारत की आजादी के लिए छेड़े गए आंदोलन का सबक था। यह महात्मा गांधी का महान ऐतिहासिक सबक था, लेकिन दुर्भाग्यवश दुनिया को अब भी यह सबक सीखना बाकी है।

महात्मा गांधी वर्ष 1906 से लेकर 30 जनवरी 1948 को अपनी मृत्यु तक अपने अहिंसक आंदोलन एवं संघर्ष के साथ अत्‍यंत सक्रिय रहे थे। इस अवधि के दौरान उन्‍होंने भारतीय एम्बुलेंस कोर के एक स्वयंसेवक के रूप में दक्षिण अफ्रीका में हुए बोअर युद्ध और ज़ुलु विद्रोह में हिस्सा लिया। महात्मा गांधी दो विश्व युद्धों के साक्षी भी बने। 

उनका अहिंसक संघर्ष काफी सक्रिय रहा था और जब भी जरूरत पड़ी, तो उन्होंने अफ्रीका में युद्ध की तरह अपनी अहिंसा को कसौटी पर रखा। जब भारत में सांप्रदायिक हिंसा की आग फैल गई तो वह भारत के पूर्वी भाग चले गए, ताकि वहां आमने-सामने रहकर हिंसक हालात का जायजा लिया जा सके।  

  Source - pib

Posted on by