"अहिंसा की नींव पर रचे गये जीवन की रचना में जितना और जैसा अधिकार पुरुष को अपने भविष्य की रचना का है, उतना और वैसा ही अधिकार स्त्री को भी अपने भविष्य तय करने का है।”
ग्रामीण महिलाओं के बारे में उन्होंने लिखा – “मैं भली भंति जानता हूं कि गांवों में औरतें अपने मर्दों के साथ बराबरी से टक्कर लेती हैं। कुछ मामलों में उनसे बढ़ी-चढ़ी हैं और हुकूमत भी चलाती हैं। लेकिन हमें बाहर से देखने वाला कोई भी तटस्थ आदमी यह कहेगा कि हमारे समूचे समाज में कानून और रूढ़ी की रू से औरतों को जो दर्जा मिला है, उसमें कई खामियां हैं और उन्हें जड़मूल से सुधारने की जरूरत है।”
स्त्रियों के अधिकारों के बारे में गांधी जी के विचार इस प्रकार थे – “स्त्रियों के अधिकारों के सवाल पर मैं किसी तरह का समझौता स्वीकार नहीं कर सकता। मेरी राय में उन पर ऐसा कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए जो पुरुषों पर न लगाया गया हो। पुत्रों और कन्याओं में किसी तरह का कोई भेद नहीं होना चाहिए। उनके साथ पूरी समानता का व्यवहार होना चाहिए।”
दहेज प्रथाहे का गांधी जी ने न केवल घोर विरोध किया बल्कि उनका विचार था कि यह प्रथा नष्ट होनी चाहिए। गांधी जी ने दहेज प्रथा के उन्मूलन के लिए जाति-बंधन को तोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने विधवाओं के पुनर्विवाह को उचित ठहराते हुए कहा कि अगर इस पावित्र्य की और हिंदू धर्म की रक्षा करना चाहते हैं, तो इस जबर्दस्ती लादे जाने वाले वैधव्य के विष से हमें मुक्त होना ही होगा। इस सुधार की शुरुआत उन लोगों को करनी चाहिए, जिनके यहां बाल-विधवाएं हों। उन्होंने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा कि बाल-विधवाओं के इस विवाह को मैं पुनर्विवाह का नाम नहीं देना चाहता, क्योंकि मैं जानता हूं कि उनका विवाह हुआ ही नहीं।
महिला शिक्षा के वे प्रबल समर्थक थे और उन्होंने अपने इस विचार को रेखांकित करते हुए कहा कि मैं स्त्रियों की समुचित शिक्षा का हिमायती हूं, लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि स्त्री दुनिया की प्रगति में अपना योग पुरुष की नकल करके या उसकी प्रतिस्पर्धा करके नहीं दे सकती। गांधी जी का यह स्पष्ट मत रहा है कि स्त्री को पुरुष की पूरक बनना चाहिए।
Source - pib