देश की शीर्ष दत्तक ग्रहण संस्था ने लिव-इन संबंधों में रह रहे जोड़ों को बच्चे गोद लेने से प्रतिबंधित कर दिया है। इसके पीछे संस्था ने यह कारण दिया है कि भारत में बिना शादी के कोहेबिटेशन (सहवास) एक स्थिर परिवार नहीं माना जाता है।
केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (कारा) किसी भी महिला को किसी भी लिंग के बच्चे को गोद लेने की अनुमति देता है, जबकि यह एकल पुरुषों को केवल लड़कों को ही गोद लेने की आज्ञा देता है।
यदि कोई आवेदक विवाहित होता है, तो पति/पत्नी दोनों को गोद लेने के लिए अपनी सहमति देनी होती है और इसके अतिरिक्त यह आवश्यक है कि उन्हें कम से कम दो वर्षों तक स्थिर विवाह में होना चाहिए।
दत्तक ग्रहण अधिनियम 2017 के अनुसार, आवेदकों को शारीरिक, वित्तीय रूप और मानसिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए और बच्चे को गोद लेने के लिए अत्यधिक प्रेरित होना चाहिए।
केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (कारा) के द्वारा हाल ही में जारी एक अधिसूचना के अनुसार, "यह निर्णय लिया गया है कि एक लिव-इन रिश्ते में एक साथी के साथ एकल पीएपी (प्रोस्पेक्टिव अडॉप्टिंग पैरेंट) को बच्चों को गोद लेने के योग्य नहीं माना जाएगा और एएफएए (अधिकृत विदेशी दत्तक ग्रहण एजेंसियों) के माध्यम से हुए उनके पंजीकरण को मंजूरी योग्य नहीं माना जाएगा।"
सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर कहा है कि एक लिव-इन रिश्ता न तो अपराध है और न ही पाप है। पिछले महीने, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वयस्क जोड़ों को एक साथ रहने का अधिकार है भले ही वे विवाहित नहीं हों।
यहां तक कि विधायिका ने घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 के प्रावधानों के माध्यम से लिव-इन रिश्तों को मान्यता दी है। इस अधिनियम के तहत, लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं को ठीक उसी प्रकार सुरक्षा प्रदान की गई है जिस प्रकार की सुरक्षा विवाह पश्चात एक महिला को दी जाती है।
केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार के तहत एक स्वायत्त निकाय है। यह भारतीय बच्चों को गोद लेने और अनिवार्य निगरानी तथा देश और अंतरदेशीय में गोद देने को विनियमित करने के लिए नोडल निकाय के रूप में कार्य करता है।