तंत्रिका तंत्र
मानव का तंत्रिकातंत्र; केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (पीले रंग में) तथा परिधीय तंत्रिका तंत्र (नीले रंग में)
इसको दो वर्गों में विभाजित कर सकते हैं :
1.केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तथा
2.स्वतंत्र तंत्रिका तंत्र।
केंद्रीय तंत्रिका तंत्र
केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को मस्तिष्क मेरु तंत्रिका तंत्र भी कहते हैं। इसके अंतर्गत अग्र मस्तिष्क, मध्यमस्तिष्क, पश्च मस्तिष्क, अनुमस्तिष्क, पौंस, चेतक, मेरुशीर्ष, मेरु एवं मस्तिष्कीय तंत्रिकाओं के 12 जोड़े तथा मेरु तंत्रिकाओं के 31 जोड़े होते हैं।
मस्तिष्क करोटि गुहा में रहता है तथा तीन कलाओं से, जिन्हें तंत्रिकाएँ कहते हैं आवृत रहता है। भीतरी दो कलाओं के मध्य में एक तरल रहता है, जो मेरुद्रव कहलाता है। यह तरल मस्तिष्क के भीतर पाई जानेवाली गुहाओं में तथा मेरु की नालिका में भी रहता है। मेरु कशेरुक नलिका में स्थित रहता है तथा मस्तिष्कावरणों से आवृत रहता है। यह तरल इन अंगों को पोषण देता है, इनकी रक्षा करता है तथा मलों का विसर्जन करता है।
मस्तिष्क में बाहर की ओर धूसर भाग तथा अंदर की ओर श्वेत भाग रहता है तथा ठीक इससे उल्टा मेरु में रहता है। मस्तिष्क का धूसर भाग सीताओं के द्वारा कई सिलवटों से युक्त रहता है। इस धूसर भाग में ही तंत्रिका कोशिकाएँ रहती हैं तथा श्वेत भाग संयोजक ऊतक का होता है। तंत्रिकाएँ दो प्रकार की होती हैं : (1) प्रेरक (Motor) तथा (2) संवेदी (Sensory)।
मस्तिष्क के बारह तंत्रिका जोड़ों के नाम निम्नलिखित हैं: (1) घ्राण तंत्रिका,
(2) दृष्टि तंत्रिका,
(3) अक्षिप्रेरक तंत्रिका,
(4) चक्रक (Trochlear) तंत्रिका,
(5) त्रिक तंत्रिका,
(6) उद्विवर्तनी तंत्रिका (Abducens),
(7) आनन तंत्रिका,
(8) श्रवण तंत्रिका,
(9) जिह्वा कंठिका तंत्रिका,
(10) वेगस तंत्रिका (Vagus),
(11) मेरु सहायिका तंत्रिका तथा
(12) अधोजिह्वक (Hypoglossal) तंत्रिका।
मस्तिष्क एवं मेरु के धूसर भाग में ही संज्ञा केंद्र एवं नियंत्रण केंद्र रहते हैं। मेरु में संवेदी (पश्च) तथा चेष्टावह (अग्र) तंत्रिका मूल रहते हैं।
अग्र मस्तिष्क दो गोलार्धों में विभाजित रहता है तथा इसके भीतर दो गुहाएँ रहती हैं जिन्हें पाश्र्वीय निलय कहते हैं। संवेदी तंत्रिकाएँ शरीर की समस्त संवेदनाओं को मस्तिष्क में पहुँचाकर अनुभूति देती हैं तथा चेष्टावह तंत्रिकाएँ वहाँ से आज्ञा लेकर अंगों से कार्य कराती हैं। केंद्रीय तंत्रिकाएँ विशेष कार्यों के लिए होती हैं। इन सब तंत्रिकाओं के अध: तथा ऊध्र्व केंद्र रहते हैं। जब कुछ क्रियाएँ अध: केंद्र कर देते हैं तथा पश्च ऊध्र्व केंद्रों को ज्ञान प्राप्त होता है, तब ऐसी क्रियाओं को प्रतिवर्ती क्रियाएँ (Reflex action) कहते हैं। ये कियाएँ मेरु से निकलनेवाली तंत्रिकाओं तथा मेरु केंद्रों से होती हैं। मस्तिष्क का भार 40 औंस होता है। मस्तिष्क की धमनियाँ अंत: धमनियाँ होती हैं, अत: इनमें अवरोध होने पर, या इनके फट जाने पर संबंधित भाग को पोषण मिलना बंद हो जाता है, जिसके कारण वह केंद्र कार्य नहीं करता, अत: उस केंद्र से नियंत्रित क्रियाएँ अवरुद्ध हो जाती हैं। इसे ही पक्षाघात (Paralysis) कहते हैं।
स्वतंत्र तंत्रिका तंत्र
यह स्वेच्छा से कार्य करता हैं। इसमें एक दूसरे के विरुद्ध कार्य करनेवाली अनुकंपी (sympathetic) तथा सहानुकंपी (parasympathetic), दो प्रकार की तंत्रिकाएँ रहती हैं। शरीर के अनेक कार्य, जैसे रुधिरपरिसंचरण पर नियंत्रण, हृदयगति पर नियंत्रण आदि स्वतंत्र तंत्रिका से होते हैं। अनुकंपी शृंखला करोटि गुहा से श्रोणि गुहा तक कशेरुक दंड के दोनों ओर रहती है तथा इसमें कई गुच्छिकाएँ (ganglions) रहती हैं।
ज्ञानेंद्रिय तंत्र
इनका वर्णन निम्नलिखित है :
घ्राणेंद्रिय - इसका अंग नासा है। इसके द्वारा गंध का ज्ञान होता है। नासा छत से घ्राण तंत्रिका गंध के ज्ञान को मस्तिष्क में ले जाती है।
स्वादेंद्रिय - जिह्वा पर के स्वादांकुर इसका अंग होते हैं, जो विभिन्न प्रकार के स्वादों को भिन्न भिन्न स्थानों से ग्रहण करते हैं।
दृष्टींद्रिय - इसका मुख्य अंग नेत्र है। नेत्र गोलक फोटो कैमरा के समान है। यह श्वेत पटल, मध्य पटल, तथा अंत पटल (रेटिना) से निर्मित है। इसमें रेटिना ही दृष्टींद्रिय का काम करता है। नेत्रगोलक छिद्र, या तारा (pupil), से प्रकाश भीतर जाता है। तारा पर आइरिस (iris) रहता है, जो तारे का संकोच और प्रसार कराता है। यह प्रकाश अग्र कक्ष के तरल, लेंस तथा पश्च कक्ष के तरल से होकर रेटिना पर पड़ता है, जहाँ से दृष्टि नाड़ियाँ इस ज्ञान को अग्र मस्तिष्क की अनुकपाल पालि (occipital lobe) को ले जाती हैं। रेटिना तंत्रिका तंत्र का ही भाग है। सबसे बाहर नेत्र में कॉर्निया (cornea) तथा उसपर एक कला रहती है। नेत्र के पास ही अक्षिगुहा में अश्रुग्रंथि एवं अश्रुथैली रहती है। नेत्र के पास ही अक्षिगुहा में अश्रुग्रंथि एवं अश्रुथैली रहती हैं। अश्रु अश्रुथैली में इकट्ठा रहता है।
श्रवणेंद्रिय - इसका अंग कर्ण है। कर्ण तीन विभागों में विभक्त है : बाह्य, मध्य एवं अंत। बाह्यकर्ण के आंतरिक छोर पर स्थित श्रवण पटल पर शब्द के कंपन, ध्वनि लहरियों के रूप में होते हैं, जिन्हें मध्य कर्ण की तीन अस्थियाँ, मैलियस (Malleus), इंकस (Incus) तथा स्टेपीज (Stapes) ग्रहण करती हैं तथा अंतकर्ण के कर्णावर्त (cochlea) की ओर भेजती हैं। कर्णांवर्त में तरल रहता है तथा श्रवण तंत्रिकाओं द्वारा ध्वनि का ग्रहण कर अग्र मस्तिष्क की शंखपालि (temporal lobe) में श्रवण का कार्य होता है। कर्ण शंखास्थि में स्थित है। अंतकर्ण में स्थित अर्धवृत्ताकार नलिकाएँ संतुलन का काम करती हैं।
स्पर्शोंद्रिय - इसके अंतर्गत त्वचा आती है। त्वचा से ही गरमी ठंढक, मृदुता, कठोरता, पीड़ा, स्पर्श आदि का ज्ञान होता है। त्वचा के दो भाग होते हैं : (1) बाह्य त्वचा तथा (2) अंतस्त्वचा। तलुए और हथेली में त्वचा की मोटाई मुख की त्वचा की मोटाई से 10 गुनी होती है। त्वचा शरीर को बाहर से आवृत्त कर रक्षा एवं मलविसर्जन भी करती है। त्वचा में एक स्तर रंजक कणों का भी होता है। त्वचा में रोमकूप तथा स्वेद ग्रंथियाँ भी होती हैं। त्वचा ताप का नियंत्रण भी करती है। इसी तरह त्वचा में अवशोषण का कार्य भी होता है। त्वचा में नख शय्या भी होती है।