नागर शैली की उत्पत्ति गुप्त काल के संरचनात्मक मंदिरों विशेषकर देवगढ़ के दशावतार मंदिर और भीतर गांव की ईंटों के बने मंदिर से हुई है। चंदेल, सोलंकी शासकों तथा बंगाल, उड़ीसा और असम के राजाओं के शासनकाल में भी इस शैली का काफी विकास हुआ।
नागर शैली के कुछ अन्य उदाहरण हैं- मध्यप्रदेश का खजुराहो मंदिर ,उड़ीसा का जगन्नाथ मंदिर ,ओडिशा का कोणार्क स्थित सूर्य मंदिर, गुजरात का मोधेरा स्थित सूर्य मंदिर।
नागर शैली की मुख्य विशेषताएं निम्न है:
सामान्यतः संपूर्ण मंदिर पत्थर के बने चबूतरे पर निर्मित होता है जिस पर ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां होती हैं।
दक्षिण भारत के मंदिरों के समान सामान्यतः इसके चारों ओर बढ़ी चारदीवारी या प्रवेश द्वार नहीं होते हैं।
यह सामान्यतः एक वर्गाकार मंदिर होता है जिस पर अनेक चित्र अंकित होते हैं।
शिखर के ऊपर एक बड़ी गोलाकार डिस्क के आकार की संरचना होती है जिसे अमालक कहा जाता है।
अमालक के ऊपर कलश होता है जो मंदिर का सर्वोच्च बिंदु होता है।
गर्भ ग्रह सदैव सबसे ऊंचे शिखर के ठीक नीचे स्थित होता है।
शिखर के आकार के आधार पर नागर शैली के मंदिरों के निम्नलिखित तीन मुख्य प्रकार हैं:
'लैटिना' या ''रेखा-प्रसाद 'शैली की मुख्य विशेषताएं निम्न है:
यह साधारण और आम तौर पर पाया जाने वाला शिखर है।
इसका आधार वर्गाकार होता है और दीवारें अंदर की ओर वक्र का ढाल बनाती हुई शीर्ष तक जाती हैं।
बाद के लैटिना शैली के मंदिर परिसर ों के रूप में विकसित हुए और मंदिर में एक शिखर की बजाय अनेक छोटे -छोटे शिखर होते थे जो एक ऊंचे पर्वत शिखरों के समूह के रूप में दिखाई पड़ते हैं जिनमें सबसे ऊंचा शिखर केंद्र में होता है।
फासमान शैली की मुख्य विशेषताएं निम्न है:
इस शैली के मंदिर लैटिना शैली के मंदिरों की तुलना मैं ज्यादा चौड़े और कम ऊंचे होते हैं।
उनकी छत में अनेक फलक होते हैं जो ऊपर जाकर मंदिर के केंद्र बिंदु का निर्माण करते हैं।
वल्लभी शैली की मुख्य विशेषताएं निम्न है:
ये यह मंदिर आयताकार होते हैं जिनके छत पर गुंबदाकार कछ होता है।
इस गुंबदाकार कक्ष के किनारे बांस या लकड़ी की गाड़ी के समान गोल होते हैं जिन्हें प्राचीन काल में शायद बैलों द्वारा खींचकर लाया गया होगा जिसके कारण इन्हें समानता 'वैगन वोल्टेड बिल्डिंग्स 'कहा जाता है।