जूनागढ़ पश्चिम भारत में काठियावाड़ के प्रायद्वीपीय क्षेत्र में स्थित था ।यहां का नवाब एक मुसलमान था जबकि अधिकांश प्रजा हिंदू थी ।जूनागढ़ 3 दिशाओं से या तो हिंदू राज्यों यह हिंदुस्तान की सरहदों से घिरा था लेकिन इसकी विशेषता यह थी कि भोपाल के विपरीत इस की चौथी दिशा में लंबा समुद्री तट था। इसका मुख्य बंदरगाह वेरावल पाकिस्तान के मुख्य बंदरगाह शहर और उसकी तत्कालीन राजधानी कराची से महज 325 नॉटिकल मील की दूरी पर था ।1947 में जूनागढ़ का नवाब मोहब्बत खान था और तरह-तरह के कुत्ते पालना उसकी दीवानगी थी उसके छोटे से चिड़ियाघर में 2000 खास नस्लों के कुत्ते थे जिसमें 16 अच्छी नस्ल के शिकारी कुत्ते थे जिन्हें खासतौर पर महल की सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया था ।
जूनागढ़ की सीमा के अंदर ही हिंदुओं का पवित्र स्थल सोमनाथ पड़ता था। इसी रियासत में गिरनार भी था जहां एक पहाड़ी की चोटी पर संगमरमर का बना हुआ जैनियों का भव्य मंदिर था। हिंदुस्तान भर से हजारों श्रद्धालु साल भर सोमनाथ और गिरनार दोनों ही जगह आते-जाते रहते थे। जूनागढ़ के जंगल एकमात्र ऐसे जंगल थे जहां एशियाई शेर पाए जाते थे । मोहब्बत खान और उसके पुरखों ने इन शेरों को काफी शिद्दत से रक्षा की थी। यहां तक की उन्होंने अंग्रेजों को भी इनका शिकार करने से मना कर दिया था। सन 1947 की गर्मियों में जूनागढ़ का नवाब यूरोप में छुट्टियां मना रहा था । जब वह बाहर ही था तो उसी समय उसके तत्कालीन दीवान को हटाकर सर शाहनवाज भुट्टो को जूनागढ़ का दीवान बना दिया गया जो सिंध के कद्दावर मुस्लिम लीगी नेता और जिन्ना के करीबी थे ।जब नवाब यूरोप से वापस लौटा तो उसके दीवान ने उसे भारतीय संघ में ना मिलने के लिए दबाव डाला 14 अगस्त 1947 को जब सत्ता हस्तांतरण का दिन आया तो नवाब ने घोषणा की कि वह पाकिस्तान में मिल जाएगा हालांकि कानूनी तौर पर उसे ऐसा करने का बिल्कुल हक था लेकिन भौगोलिक रूप से इसका कोई मतलब नहीं था। यह जिन्ना के दो राष्ट्रवाद के सिद्धांत से भी मेल नहीं खाता था क्योंकि रियासत की 82 फ़ीसदी प्रजा हिंदू थी । पाकिस्तान जूनागढ़ का इस्तेमाल जम्मू कश्मीर पर सौदेबाजी करने के लिए कर रहा था। कश्मीर भी 15 अगस्त तक किसी भी देश में शामिल नहीं हुआ था वहां का राजा एक हिंदू था जबकि उसकी अधिकांश प्रजा मुसलमान थी कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कश्मीर जूनागढ़ का उल्टा था।
क्रमशः.....