क्रमशः ...
Day- 67
मूल अधिकार या मौलिक अधिकार
- मूल अधिकारों का सर्वप्रथम विकास ब्रिटेन में तब हुआ, जब 1215 ई. में सम्राट जान को ब्रिटिश जनता ने प्राचीन स्वतंत्रताओं को मान्यता प्रदान करने हेतु ‘मैग्नाकार्टा’ पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया। इसके बाद ब्रिटिश जनता ने 1689 ई. में सम्राट को उन अधिकारों के विधेयक पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य कर दिया जो उनके सम्राटों द्वारा समय-समय पर जनता को दिये गये थे।
- संयुक्त राज्य अमरीका के मूल संविधान में मूल अधिकारों का उल्लेख नहीं किया गया था लेकिन 1791 ई. में दसवें संविधान (संशोधन) द्वारा ‘अधिकार पत्र’ (Bill of Rights) को जोड़ा गया।
- फ्रांस में भी जनता ने सम्राट को मानव तथा नागरिकों के अधिकारों के घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य कर दिया था। फ्रांस की जनता मानव अधिकारों के प्रति इतनी सजग थी कि वहाँ 1789 ई. में फ्रांस के लूई सोलहवें को इसलिए फाँसी पर चढ़ा दिया था क्योंकि उसने जनता के मूल अधिकारों का उल्लंघन किया था।
- भारत में मूल अधिकारों की सर्वप्रथम मांग संविधान विधेयक 1895 ई. के माध्यम से की गई। इसके पश्चात् 1917-1919 के दौरान कांग्रेस द्वारा अनेक संकल्प पारित करके मांग की गई कि भारतीयों को अंग्रेजों के समान सिविल अधिकार तथा समानता का अधिकार प्रदान किया जाय।
- संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा के गठन की योजना प्रस्तुत करने वाले कैबिनेट मिशन द्वारा सुझाव दिया गया था कि मूल अधिकारों, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सिफारिश करने के लिए एक समिति का गठन किया जाना चाहिए। इसलिए संविधान सभा ने सरदार पटेल की अध्यक्षता में ‘प्रामर्श समिति’ का गठन किया। बाद में जे.बी. कृपलानी की अध्यक्षता में मूल अधिकारों तथा अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सिफारिश करने के लिए एक उपसमिति गठित की गई। परामर्श समिति तथा उपसमिति की सिफारिशों के आधार पर संविधान में मूल अधिकारों को शामिल किया गया। जब संविधान का प्रवर्तन किया गया उस समय मूलाधिकारों की संख्या 7 थी लेकिन 44वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 द्वारा सम्पत्ति आर्जन करने के मूल अधिकार को समाप्त करके इस अधिकार को विधिक अधिकार बना दिया गया है।

मिलते है हम अगले दिन, नये अधिकार या मौलिक अधिकार विषय पर फिर आगे चर्चा करने के