पाकिस्तान द्वारा जूनागढ़ के विलय को स्वीकार कर लिए जाने से भारतीय नेता काफी नाराज हुए। इस घटना ने खासकर वल्लभ भाई पटेल की कमजोर नस को दबा दिया था जो इसी इलाके से आते थे और जूनागढ़ के लोगों की तरह ही वही जुबान गुजराती बोलते थे। उनकी पहली प्रतिक्रिया थी कि सबसे पहले जूनागढ़ के दो कर राज्य मांगरोल और बाबरिया बाद को सुरक्षित किया जाए ।वहां के हिंदू सरदारों ने कहा कि उन्हें भारत में मिलने का अधिकार है लेकिन नवाब ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उनके अधीनस्थ के रूप में उन्हें पहले उससे इजाजत लेनी होगी भारत सरकार ने नवाब के अधीनस्थ वाले राज्यों का समर्थन किया और एक छोटी सी सैनिक टुकड़ी उस पर कब्ज़ा करने के लिए भेज दी। सितंबर मध्य में वी पी मेनन नवाब से समझौता करने जूनागढ़ गए लेकिन नवाब ने उनसे बीमार होने का बहाना बनाकर मिलने से इंकार कर दिया । मेनन को दीवान से मुलाकात करनी पड़ी ।उन्होंने सर शाहनवाज से कहा कि भौगोलिक और सांस्कृतिक सांस्कृतिक दोनों ही वजहों से जूनागढ़ को हिंदुस्तान में शामिल हो जाना चाहिए। सर नमाज ने इनकार नहीं किया लेकिन उनसे शिकायत की कि स्थानीय लोगों की भावनाओं को गुजराती प्रेस द्वारा जहरीले लेखन से भड़काया गया है ।उन्होंने कहा कि वह जाती तौर पर चाहेंगे की मुुद्दे को जनमत संग्रह द्वारा हल किया जाए। इसी बीच श्यामलदास गांधी द्वारा जूनागढ़ की एक वैकल्पिक सरकार का गठन मुंबई में किया गया। श्यामलदास महात्मा गांधी के भतीजे और जूनागढ़ के रहने वाले थे ।यह सरकार जूनागढ़ में चल रहे लोकप्रिय आंदोलन का मुख्य केंद्र बिंदु बन गई ।इन घटनाओं से नवाब घबरा गया और अपने कुछ प्रिय कुत्तों को साथ लेकर कराची भाग गया ।अब रियासत का सारा जिम्मा दीवान के कंधों पर आ गया ।27 अक्टूबर को सर शाहनवाज ने जिन्ना को लिखा कि जूनागढ़ के पाकिस्तान में विलय के फैसले के तुरंत बाद आप को और मुझे खासकर मुसलमानों द्वारा सैकड़ों बधाई के पत्र मिले थे लेकिन हमारे बिरादरी बिल्कुल अलग और ठंडा रुख अख्तियार किए हुए हैं ऐसा लगता है कि काठियावाड़ के मुसलमानों में पाकिस्तान के प्रति सारा उत्साह काफूर हो गया है। इसके 10 दिन बाद सर शाहनवाज ने भारत सरकार को सूचित किया कि वह जूनागढ़ का प्रशासन भारत सरकार के सुपुर्द कर देने को तैयार हैं और औपचारिक रूप से प्रशासन का हस्तांतरण 9 नवंबर को हो ही गया। दिल्ली में माउंटबेटन इस बात को सही नहीं मान रहा था कि जूनागढ़ पर अधिकार के संबंध में उससे राय नहीं ली गई। कुछ माउंटबेटन को संतुष्ट करने के लिए और कुछ इस की वैधानिकता को स्थापित करने के लिए भारत सरकार ने फिर से एक जनमत संग्रह का आयोजन करवाया ।20 फरवरी 1948 को हुए जनमत संग्रह में जूनागढ़ के 91फ़ीसदी लोगों ने हिंदुस्तान में शामिल होने का फैसला कर लिया।