असहयोग आंदोलन के स्थगित कर दिए जाने के पश्चात कांग्रेस के पास कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं रह गया था। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी तथा डॉ राजेंद्र प्रसाद आदि कुछ कांग्रेस नेता चरखा पर हाथ से कढ़ाई करने हरिजनों धार मगर त्याग को लोकप्रिय बनाने आदि जैसे रचनात्मक कार्यों में लगे रहे। लेकिन मोती लाल नेहरू तथा चितरंजन दास के नेतृत्व में कांग्रेस जनों के एक समूह ने भारत सरकार अधिनियम 1919 के अंतर्गत किए जाने वाले 1923 के चुनावों में भाग लेने की इच्छा व्यक्त की और इस प्रकार उन्होंने विधान परिषदों में प्रवेश करने में प्रति रूचि प्रकट की । इन दो विचारधाराओं के बीच कांग्रेस के मतभेद हो गया परिवर्तन विरोधी विधान परिषद में प्रवेश के विरोधी थे तथा परिवर्तन समर्थक चुनाव लड़ना चाहते थे।
परिवर्तन समर्थक नेताओं के गुट में चितरंजन दास विट्ठल भाई पटेल मोतीलाल नेहरू आदि प्रमुख थे तो आप परिवर्तनवादी गुट में राजेंद्र प्रसाद वल्लभभई पटेल तथा राजगोपालाचारी थे। सी आर दास ने गया अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए काउंसिल में प्रवेश का प्रस्ताव रखा परंतु उनका प्रस्ताव 890 बटा 1740 मतों से खारिज हो। अंततः सी आर दास ने कांग्रेस के अध्यक्षता से त्यागपत्र दे दिया तथा मोतीलाल नेहरू तथा अन्य परिवर्तन समर्थकों के साथ मिलकर कांग्रेस खिलाफत स्वराज पार्टी की स्थापना की। स्वराज पार्टी में भी कांग्रेस के सिद्धांतों को भी मंजूरी प्रदान की अंतर इतना था कि वे रचनात्मक कार्य करने के बदले काउंसिल में प्रवेश कर सरकार के अंक्रमद्यता को प्रकट करना चाहते थे। अंततः सितंबर 1923 के विशेष दिल्ली अधिवेशन में मौलाना कलाम के प्रयासों से कांग्रेस कार्यसमिति ने स्वीकार कर लिया कि कांग्रेस व्यक्तिगत तौर पर चुनाव में खड़े हो सकते हैं इस प्रस्ताव से कांग्रेस में औपचारिक फूट पड़ने से बच गया।
गांधी तथा सी आर दास के मध्य एक एक् हुआ जिसके अनुसार तय हुआ कि गांधीजी तथा उनके अनुयाई रचनात्मक कार्यक्रम चलाएंगे जबकि स्वराज पार्टी के लोग राजनीतिक आंदोलन। रचनात्मक कार्यक्रम चलाएंगे जबकि स्वराज पार्टी के लोग राजनीतिक आंदोलन। इस एक्ट मैं यह सहमति बनी कि स्वराज पार्टी स्वतंत्रता रूप से अपना कार्य संचालन करेगी तथा अपना निजी सचिवालय रखेगी गांधी दास एक्ट को 1924 के बेलगांव अधिवेशन में मंजूरी दे दी गई।