आजाद हिंद फौज

आजाद हिंद फौज का ख्याल सबसे पहले कैप्टन मोहन  सिंह के मन मैं मलाया मे आया। वह ब्रिटेन के भारतीय सेना के अफसर थे जब ब्रिटिश सेना पीछे हट गई थे तो मोहन सिंह जापानियों के साथ हो गए वह जापानी भर्तियों में ब्रिटिश विरोधी भावनाओं को भड़का देते रहें लेकिन उन्होंने भारतीयों को सैनिक स्तर पर संगठित करने के बारे में नहीं।

जापानियों ने जब भारतीय युद्ध बंदियों को मोहन सिंह के सपुद्र कर दिया  तो वह उनमें से लोगों को आजाद हिंद फौज में भर्ती करने लगे। सिंगापुर का जापानियों के हाथ में आना इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे 45000 लोग आजाद हिंद फौज में शामिल होने के इच्छुक हो चले थे। भारतीयों का नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों और भारतीय सैनिक अधिकारियों के बीच विभिन्न बैठक में या बार-बार स्पष्ट किया गया कि आजाद हिंद फौज कांग्रेस और भारतीय जनता के आह्वान पर ही हरकत में आएगी बहुत से लोग यह भी मानते थे कि आजाद हिंद फौज के कारण दक्षिण पूर्व एशिया में जापान भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा या भारत पर कब्जा करने के बारे में नहीं सोचेगा।

भारत छोड़ो आंदोलन से आजाद हिंद फौज को भी एक नई ताकत मिली। मलाया में ब्रिटिश विरोधी प्रदर्शन किए गए। 1 सितंबर 1942 को आजाद हिंद फौज की पहली डिवीजन का गठन 16300 सैनिकों को लेकर किया गया। जापानी तब तक भारत पर हमला करने के बारे में सोचने लगे थे और उन्हें भारतीयों का सैनिक रूप से संगठित होना लाभप्रद प्रतीत हो रहा था। लेकिन दिसंबर 1942 के आते-आते आजाद हिंद फौज की भूमिका के बारे में जापानी और भारतीय अधिकारियों में गहरे मतभेद पैदा हो गए थे। मोहन सिंह और निरंजन सिंह गिल को गिरफ्तार कर लिया गया। दरअसल जापानी चाहते थे कि भारतीय फौज 2000 सैनिकों को ही जाने प्रतीकात्मक हो जबकि मोहन सिंह का लक्ष्य था 200000 सिपाहियों का था।

आजाद हिंद फौज का दूसरा चरण उस वक्त शुरू हुआ जब सुभाष चंद्र बोस को जर्मन और जापानी पनडुब्बियों द्वारा 2 जुलाई 1993 को सिंगापुर लाया गया वहां से वह टोक्यो गए हैं और उसके बाद ही जापान के प्रधानमंत्री तो जो ने घोषणा की कि जापान भारत पर कब्जा करना नहीं चाहता वह सिंगापुर लौट आए और वहां उन्होंने 21 अक्टूबर 1945 को स्वाधीन भारत की सरकार गठित की।

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