माउंटबेटन योजना

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने 20 फरवरी 1947 को हाउस ऑफ कॉमंस में घोषणा की कि उनकी सरकार की यह निश्चित इच्छा है कि जून 1948 ईस्वी तक भारत को स्वतंत्रता अवश्य दे देंगे। इस ऐतिहासिक निर्णय से पूरे देश में हर्ष और उल्लास का नया वातावरण पैदा हो गया इसी समय लॉर्ड वेवेल को वापस बुला लिया गया तथा लॉर्ड माउंटबेटन मार्च 1947 में भारत का अंतिम गवर्नर जनरल नियुक्त हुआ। उसने आते ही परिस्थिति का निरीक्षण किया तथा कांग्रेस वालों लीग से  लंबी बातचीत  की और अंत में देश के विभाजन का निर्णय लिया गया। राष्ट्रवादी नेताओं ने भी मजबूरन भारत विभाजन का निर्णय स्वीकार कर लिया है क्योंकि पिछले 70 वर्षों के दौरान हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिकता का विकास किस प्रकार हुआ था कि विभाजन ना होता तो शायद सांप्रदायिकता का विकास किस प्रकार हुआ था कि विभाजन ना होता तो शायद सांप्रदायिकता के बाढ़ में हजारों लोगों को बहना पड़ता। सबसे बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि सांप्रदायिक दंगे देश के किसी एक वर्ग तक समिति ना होकर संपूर्ण देश में हो रहे थे जिनमें हिंदू और मुसलमान दोनों की सक्रिय भागीदारी थी तथा तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने भी दंगों को रोकने का कोई प्रयास नही किया।

3 जून 1947 को भारत और पाकिस्तान दोनों के स्वाधीन होने की घोषणा की गई रजवाड़ों को इस बात की छूट दी गई कि वह जिस राज्य में चाहे  सम्मिलित हो सकते हैं। अतः अधिकतर रजवाड़े भारतीय राज्य में सम्मिलित हो गए वास्तविक सत्ता का हस्तांतरण 14 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को किया गया और इसके साथ ही भारत और पाकिस्तान नामक दो राष्ट्रों का उदय हुआ। 15 अगस्त 1947 को भारत ने हर्षोल्लास के साथ अपना पहला स्वाधीनता दिवस मनाया।

यह हर्षोल्लास जिसे असीम और अभोद होना चाहिए था दुख और दर्द से भरा हुआ था सदियों के बाद प्राप्त हुए स्वतंत्रता के इस क्षण में सांप्रदायिकता का दानव जहान नरसंहार में व्यस्त था वह अपनी जन्मभूमि से नाता तोड़कर लाखों शरणार्थी हर रोज इन दोनों राज्यों में पहुंच रहे थे। गांधीजी जिन्होंने भारतीय जनता को अहिंसा सत्य प्रेम साहस तथा शूरवीरता का संदेश दिया था और जो भारतीय संस्कृति के उत्कृष्टतम तत्वों के प्रतीक हैं खुशी के इन दिनों में भी बंगाल के नोआखली के गांव में चक्कर लगा रहे थे तथा सांप्रदायिक दंगों से पीड़ित लोगों को सहारा पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे।

Posted on by