वायुमंडलीय दाब और दाब पेटियां

 वायुमंडलीय दाब-

                           वायुमंडलीय दाब से तात्पर्य एक निश्चित समय एक एकांक क्षेत्रफल पर हवा के उत्पन्न किए गए दाब से है वायुदाब मापने के लिए बैरोमीटर नामक यंत्र का प्रयोग किया जाता है परंतु जलवायु वैज्ञानिकों के द्वारा वायुमंडलीय दाब मापने के लिए MB नाम की इकाई का प्रयोग किया जाता है एक मिली बार 1 cm2  पर भार के बल के बराबर होता है वायुमंडलीय दाब को दर्शाने में समदाब रेखाएं का प्रयोग किया जाता है समदाब रेखाएं ऐसे काल्पनिक रेखा है जो समुद्र तल के ऊपर बराबर वायुमंडलीय दाब वाले स्थानों को मिलाती हैं यदि समदाब पास पास हो तो ताप प्रबलता बल अधिक होगा और समदाब रेखाएं दूर हो तो यह कम दाब प्रबलता का सूचक है ।

वायुमंडलीय दाब का वितरण-

                                           धरातल पर वायुमंडलीय दाब का वितरण दो प्रकार देखा जाता है ऊर्ध्वाधर वितरण तथा क्षैतिज वितरण ।

ऊर्ध्वाधर वितरण-

                           सामान्य रूप से धरातल के सतह से ऊंचाई बढ़ाने से वायुमंडलीय दाब में कमी आती है परंतु ऊंचाई के साथ वायुमंडलीय दाब घटाने का कोई निश्चित नियम नहीं है क्योंकि धरातल पर जलवाष , धूल के कण , वायु के घनत्व एव पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव का वितरण असमान रूप से है क्योंकि यह सभी तत्व अलग-अलग अक्षांशों में विभिन्न प्रकार के अलग-अलग रूपों में वितरित हैं इसीलिए उर्ध्वाधर वायुमंडलीय दाब का गिरना भी असमान है इसके बावजूद भी छोभ मंडल में प्रति 300 मीटर की ऊंचाई पर 34 MB वायुमंडलीय दाब में कमी आती है ।

अक्षांशीय वितरण (क्षैतिज वितरण ) -

                                                       धरातल पर वायुमंडलीय दाब का वितरण वायुदाब पेटियों के रूप में है और वायुदाब पेटियां कुछ निश्चित अक्षांशों के धरातल पर कोई चार प्रकार की  पेटियां पाई जाती हैं  जिनके नाम इस प्रकार हैं ।

1- विषुवत रेखीय निम्न दाब की पेटी ।

2- उषोष्ट उच्च दाब की पेटी ।

3- उप ध्रुवीय निम्नतम की पेटी ।

4-  ध्रुवीय उच्च दाब की पेटी ।

                                          इसमें विषुवत रेखीय निम्न की पेटियां ध्रुवो उच्च दाब पेटियों का निर्माण तापीय प्रभाव से होता है जबकि उषोष्ट उच्च दाब एवं उप ध्रुवीय निम्न दाब की पेटी निर्माण गतिकीय कारणों से होता है यह सभी वायुदाब पेटियां भूमंडल व्यापक प्रभाव डालती हैं तथा सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन होने से इसके स्थिति में परिवर्तन होता है जो कई प्रकार के मौसमी प्रभावों को उत्पन्न करती हैं ।

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