कुतुबुद्दीन ऐबक कालीन स्थापत्य

भारत में तुर्की स्थापत्य का विकास कुतुबुद्दीन ऐबक के काल में प्रारंभ होता है। इस काल में ही भारत में पहली मस्जिद का निर्माण कुवत - उल - इस्लाम मस्जिद के नाम से प्रारंभ हुआ । इस मस्जिद का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक के काल में निर्मित किला-ए- राय पिथौरा के स्थान पर अत्यंत जल्दबाजी में किया गया था। इस मस्जिद की सबसे बड़ी विशेषता थी उसका उत्कृष्ट मकसुरा तथा उससे जुड़ा किव्ला- लीबान। इस मस्जिद में हिंदू इस्लामी स्थापत्य कला की मजबूती तथा सौंदर्य कि समन्वित विशेषता पहली बार उभरकर आई है। इस स्थापत्य का मेहराब प्रभावशाली है परंतु यह वास्तविक मेहराब जैसी मजबूती को नहीं प्राप्त कर सका है।

इसी काल में तुर्की विजय की स्मृति के प्रतीक के रूप में कुत्तुब मीनार (वर्तमान महरौली दिल्ली स्थित) का भी सल्तनत कालीन स्थापत्य में एक महत्वपूर्ण स्थान है। कुतुबमीनार में इंडोर इस्लामी स्थापत्य शैली के मूल विशेषता दृढ़ता तथा सौंदर्य की भरपूर झलक मिलती है 72. 5 मीटर की प्रभावशाली ऊंचाई वाले इस मीनार के दीवारें ढलान लिए हुए हैं जिससे जमीन पर उसकी 15 मीटर की चौड़ाई ऊपर जाकर केवल 3 मीटर की रह जाती है। इसका निर्माण पूर्णतया लाल बलुआ पत्थर से किया गया है। इस मीनार का मुख्य आकर्षण इसके छज्जों को बनाने की कौशल पूर्ण विधि में है। मीनार की दीवारों पर धारदार एवं को कोणीय प्रक्षेपो के प्रयोग, पैनल एवं ऊपरी चरणों लाल के साथ सफेद बालू पत्थरों के प्रयोग के कारण इसकी प्रभाव नियता और बढ़ जाती है।

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