सभा और विदथ में महिलाएँ भाग लेती थी, किन्तु समिति में नहीं।
सेनानी, ग्रामणी, सूत (रथकार), कर्मार को सम्मिलित रूप से रत्नी कहा जाता था।
ऋग्वेद कालीन प्रमुख विदुषी स्त्रियाँ-लोपमुद्रा, घोषा, विश्ववारा, अपाला थी। इस काल स्त्रियों को राजनीति और सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार प्राप्त नहीं थे।
ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों में पुनर्विवाह, नियोग और बहुपति विवाह प्रचलित था जबकि सती प्रथा का प्रचलन नहीं था।
ऋग्वेद में चावल, नमक, मछली, चाँदी, बाघ, हाथी, लोहा का उल्लेख नहीं है।
ऋग्वैदिक काल में कृषि की अपेक्षा पशुपालन का अधिक महत्व था।
ऋग्वेद की देवमण्डली में 33 देवताओं का उल्लेख मिलता है।
ऋग्वेद के 10वें मण्डल में एकेश्वरवाद का दर्शन होता है।
राजा की उत्पत्ति का सिद्धान्त सर्वप्रथम ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है।
अथर्ववेद में परीक्षित को मृत्युलोक का देवता कहा गया है।
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कैकेय के राजा
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अश्वपति
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काशी के राजा
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अजातशत्रु
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विदेह के राजा
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जनक
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कुरू के राजा
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उद्वालक आरूणी
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पंचाल के राजा
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प्रवाहण जैबलि
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उत्तर वैदिक काल में राष्ट्र शब्द का उल्लेख पहली बार मिलता है।
पुरू + भरत जन = कुरू
तुर्वस + क्रिवि जन = पंचाल
राज्याभिषेक राजसूय यज्ञ से सम्बन्धित है।
उत्तर वैदिक काल की प्रमुख विदुषी स्त्रियाँ मैत्रेयी और कात्यायनी (याज्ञवल्क्य की पत्नी थी), गार्गी, सुलभा, वेदवती, काशकृत्सनी है।
-शेष अगले भाग में