छान्दोग्य उपनिषद में केवल तीन आश्रमों तथा जाबालोपनिषद में सर्वप्रथम चारों आश्रमों का वर्णन मिलता है।
आजीवन शिक्षा प्राप्त करने वाली स्त्रियाँ ब्रह्मवादिनी कहलाती थी जबकि विवाह पूर्व शिक्षा प्राप्त करने वाली स्त्रियाँ सद्योवधू कहलाती थी।
शिक्षा समाप्ति का संस्कार समावर्तन था। जिसके बाद ब्रह्मचारी गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था।
उत्तरवैदिक कालीन आर्यो को लोहे (श्याम अयस अथवा कृष्ण अयस) की ज्ञान हो गया था। लोहे का प्राचीनतम साक्ष्य अतरंजीखेड़ा (एटा) से प्राप्त होता है।
तैत्तिरीय संहिता में ऋण के लिए कुशीद शब्द तथा शतपथ ब्राह्मण में ऋण देने वाले के लिए कुसीदिन शब्द का प्रयोग हुआ है।
उत्तर वैदिक काल में बाँट की मूल इकाई रत्तिका या गंुजा थी। शतमान, पाद, कृष्णल माप की विभिन्न इकाइयाँ थी। द्रोण अनाज मापक था।
सौत्रामणि यज्ञ में सुरा की आहुति दी जाती थी।
पुरूष मेध यज्ञ में पुरूष की बलि दी जाती थी। इसमें सर्वाधिक 25 यूपों (यज्ञ स्तम्भ) का निर्माण किया जाता था।
सोमयज्ञ को अग्निष्टोम यज्ञ भी कहा जाता है।
वाजपेय यज्ञ करने वाले सम्राट की उपाधि धारण करते थे।
राजसूय यज्ञ में मुख्य पुरोहित को 240000 गाये दान में दी जाती थी।
उपनयन संस्कार का उद्देश्य मुख्यतः शैक्षणिक था।
-शेष अगले भाग में