युद्व के लिये गविष्टि शब्द का प्रयोग किया जाता था। जिसका अर्थ है गायो की खोज।
दसराज्ञ युद्व का वर्णन सातवंे मंडल में है। यह युद्ध परुष्णी (रावी) नदी के तट पर सुदास एवं दस जनों के मध्य लड़ा गया जिसमें सुदास विजयी हुआ।
ऋग्वेद के 10वें मंण्डल में मे चतुर्वर्णो का उल्लेख मिलता है।
आर्यो का सामाज पितृ सत्तात्मक था।
समाज की सबसे छोटी ईकाई परिवार या कुल थी जिसका मुखिया पिता होता था जिसे कुलप कहा जाता था।
इस काल में स्त्रियों को सम्पति एवं राजनीति का अधिकार नही था।
इस काल में स्त्रियाँ अपने पति के साथ यज्ञ कार्य में भाग लेती थी।
बाल विवाह एवं पर्दा प्रथा का प्रचलन नही था।
नियोग प्रथा का चलन था। जिसमंें विधवा पुत्र प्राप्ति के लिए अपने देवर से सम्बन्ध स्थापित करती थी।
ऋग्वेद में लोपामुदा, घोषा, अपाला एवं विश्वारा जैसे विदुषी स्त्रियांे का वर्णन है।
जीवन भर अविवाहित रहने वाली कन्याओं को अमाजू कहा जाता था।
आर्यो का मुख्य पेय पदार्थ सोमरस था।
आर्यो का मुख्य व्यवसाय कृषि एवं पशुपालन था।
आर्यो का प्रिय पशु घोड़ा था।
व्यापार करने वाले वर्ग को पणि कहा जाता था।
लेन-देन में वस्तु विनिमय प्रणाली प्रचतिल थी।
व्याज पर रूपया देने वाले को बेकनाट (सूदखोर) कहा जाता था।
-शेष अगले भाग में