क्रमशः ...
Day- 68
- भारतीय संविधान की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसके भाग-3 के अनुच्छेद 12 से 30 तक तथा 32 से 35 (कुल 23 अनुच्छेदों) में व्यक्तियों के मूल अधिकारों के सम्बंध में उतना व्यापक वर्णन किया गया है जितना विश्व के किसी भी लिखित संविधान में नहीं किया गया है। इस विशद वर्णन के बावजूद संविधान मूल अधिकार को परिभाषित करने में गौण है। मूल अधिकारों को उन अधिकारों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के लिए आवश्यक हों। ये अधिकार व्यक्ति के बौध्दिक विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं।
- मूल अधिकारों का उद्देश्य – भारतीय संविधान में शामिल किये गये मूल अधिकारों के निम्नलिखित उद्देश्य हैं –
- एक ऐसी सरकार का गठन करना, जिसका उद्देश्य व्यक्तियों के हितों में अभिवृध्दि करना हो,
- सरकार की शक्तियों को सीमित करना, जिससे सरकार नागरिकों की स्वतंत्रता के विरुध्द अपनी शक्ति का प्रयोग न कर सके, और
- नागरिकों के व्यक्तित्व का विकास करना
- संविधान के अनुच्छेद 13 में मुलाधिकार से सम्बन्धित निम्नलिखित सिध्दांतों को शामिल किया गया है –
- न्यायिक पुनर्विलोकन
- भावी प्रवर्तन का सिध्दांत
- पृथक्करणीयता का सिध्दांत
- अधित्यजन का सिध्दांत
- आच्छादन का सिध्दांत
- मुलाधिकार का प्रभाव भूतलक्षी नहीं है, बल्कि इसका भावी प्रभाव है। संविधान का अन्तिम निर्वचनकर्त्ता उच्चतम न्यायालय है। ‘मिनर्वा मिल बनाम भारत संघ (1980)’ के मामले में उच्चतम न्यायालय के 5 न्यायाधीशों की एक संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से यह निर्णय दिया कि संसद संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान के मूल ढ़ांचे में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती है। यही मत उच्चतम न्यायालय ने अन्य कई मामलों के निर्णय में व्यक्त किया है।
मिलते है हम अगले दिन, नये अधिकार या मौलिक अधिकार विषय पर फिर आगे चर्चा करने के..