समुद्र असीम संसाधनों एवं व्यापारिक मार्गो के अतिरिक्त अन्य सामाजिक दृष्टि से ऐतिहासिक है इस कारण से अंतरराष्ट्रीय संघर्ष की स्थिति बन सकती है जिसके शांतिपूर्ण समाधान के लिए समुद्र विधि का संकलन किया गया है
1945 के बाद एशिया अफ्रीका अमेरिका देश उन दिनों स्वतंत्र की संख्या बढ़ने लगी यहां देश उपनिवेशों का शोषण से मुक्त हुए इसी प्रकार 9 स्वतंत्र देशों में धीरे-धीरे जनसंख्या में वृद्धि हो रही थी और जन कल्याण के लिए इंसान साधनों की जरूरत थी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी अत्यधिक प्रगति हुए जिससे ना केवल महासागरीय संसाधनों के बारे में बड़े पैमाने पर मिली बल्कि महासागरीय संसाधन का दोहा भी संभव हुआ इस बदलती हुई सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों में महासागरों के संसाधन का उपयोग की तरफ विकासशील देशों का ध्यान भी आकर्षित हुआ इन देशों में यू एन ओ के मंच पर महासागरीय संसाधनों के उपयोग को लेकर विकसित देशों के अधिकारों को चुनौती के फलस्वरुप दावे एवं प्रति दावे यूएनओ नेतृत्व में 1958 में प्रथम समुद्री सम्मेलन का आयोजन जिनेवा में किया गया परंतु यहां पर कोई महत्वपूर्ण निष्कर्ष नहीं निकला था 1982 में समुद्री सम्मेलन में महासागरीय जल क्षेत्र एवं वहां के संसाधनों के उपयोग की दृष्टिकोण से से सागरीय क्षेत्र को चार वर्गों में रखा गया ।
1- तटीय जल क्षेत्र
2- समवर्ती जल क्षेत्र
3- उन्नयन आर्थिक जल क्षेत्र
4- उच्च सागर जल क्षेत्र
तटीय जल क्षेत्र-
यह हुआ जल क्षेत्र है जो किसी भी राष्ट्र के आधार रेखा से 12 nm समुद्री क्षेत्र होता है इस जल क्षेत्र पर सीमावर्ती राष्ट्र के प्रत्येक प्रकार के संप्रदाय मानी गई है यहां पर स्थाई नौसेना केंद्र बनाया जा सकते हैं तथा यह युद्धाभ्यास भी किया जा सकता है ।
समवर्ती जल क्षेत्र -
तटीय क्षेत्र से आगे 12 nm के सागरीय क्षेत्र में समवर्ती कहते हैं यहां पर समवर्ती राष्ट्र युद्धाभ्यास कर सकते हैं परंतु स्थाई नौसेना केंद्र स्थापित नहीं कर सकते हैं यहां पर यदि कोई विदेशी जहाज समुद्र विधि के तहत गैर कानूनी कार्य करते हुए पाए जाते हैं तो उनके विरुद्ध सैनिक कार्यवाही की जा सकती है इसलिए इस जल क्षेत्र को सरगर्मी दुश्मन के जहाज का पीछा करना होता है यहां पर पारगमन का सिद्धांत भी लागू होता है अर्थात यदि कोई विदेशी जहाज इस क्षेत्र में प्रवेश करना चाहे तो उसे कस्टम शुल्क अदा करना होता है ।
उन्नयन आर्थिक क्षेत्र-
किसी भी राष्ट्र के आधार से 200 nm के सागरीय क्षेत्र में उन्नयन आर्थिक क्षेत्र कहते हैं यहां पर समवर्ती राष्ट्र को प्रत्येक प्रकार के आर्थिक संसाधन (पेट्रोलियम, गैस ,खनिज ) के प्रकार के संसाधनों का दोहन का अधिकार है परंतु इस जल क्षेत्र का उपयोग सैन्य कार्यवाही के लिए नहीं किया जा सकता है ।
उच्च सागर क्षेत्र -
200 nm सेआगे सागर के विस्तृत क्षेत्र को उच्च सागर कहते हैं यहां पर किसी भी राष्ट्र का एकाधिकार या विशेषाधिकार ना होकर संपूर्ण मानव जाति के समानता का सिद्धांत लागू है इस जल क्षेत्र का प्रयोग अंतर्राष्ट्रीय परिवहन के लिए किया जाता है तथा समुद्री परितंत्र के संरक्षण के लिए अनुसंसाधन के कार्य भी किया जाता है ।