1753 ई. का राजपत्र (चार्टर)
देश की राजनीतिक उथल-पुथल ही सन् 1753 ई. के राजपत्र की स्वीकृति का कारण था।
08 जनवरी, 1753 ई. को ब्रिटिश क्राउन ने 1753 ई. के राजपत्र (चार्टर) पर अपनी सहमति जताई।
इस राजपत्र के द्वारा ही सन् 1726 ई. के चार्टर द्वारा उत्पन्न कठिनाइयों को हल करने का प्रायस किया गया।
1757 के प्लासी युध्द तथा 1764 के बक्सर युध्द में मिली सफलता से कम्पनी का भारत में शासन स्थापित हो गया और यहीं से भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव पड़ी।
1765 ई. में कम्पनी ने मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय से बंगाल, बिहार, तथा उड़ीसा की दीवानी प्राप्त कर ली। इसके परिणामस्वरुप इन इलाकों में मालगुजारी वसूलने तथा दीवानी न्याय-प्रशासन की जिम्मेदारी कम्पनी पर आ गयी। इस प्रकार कम्पनी की भूमिगत प्रभुसत्ता स्थापित हो गई।
कम्पनी की भारत में प्रभुसत्ता स्थापित हो जाने पर ब्रिटेन की सरकार कम्पनी पर नियंत्रण पाने के लिए तत्पर हो उठी। लार्ड नार्थ की सर्कार ने एक ‘गोपनीय समिति’ (सीक्रेट कमेटी) के गठन की घोषणा की जिसे कम्पनी के शासन व न्यायव्यवस्था के बारे विरुध्द आख्या प्रस्तुत करनी थी।
कम्पनी के नौकरशाहों का यद्यपि भारत में वेतन काफी कम था परन्तु ब्रिटेन वापस जाते समय वे अपार धन ले जाते थे। भारत से वापस गए कम्पनी के गवर्नर ब्रिटेन में नवाब कहलाते थे।
कम्पनी की आर्थिक स्थिति दिन-प्रतिदिन गिरती जा रही थी। कम्पनी को 4 लाख पौण्ड की धनराशि कर के रुप में प्रतिवर्ष ब्रिटेन की सरकार को देने के लिए बाध्य किया गया। इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर लार्ड नार्थ की सरकार ने कम्पनी के आन्तरिक मामलों में दखल दिया।
“सन् 1765 ई. को ऐंग्लो-इण्डियन इतिहास का युग प्रवर्त्तक काल समझा जा सकता है क्योंकि इसी समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी का भारत में प्रादेशिक सम्प्रभुता स्थापित करने का काल आरम्भ होता है। अब कम्पनी अपने व्यापारिक रुप को पूर्णतया त्याग कर एक वास्तविक शासक के रूप में सामने आयी।“
- मिस्टर इलबर्ट
यही पर समाप्त होता है ‘अंग्रेजो का भारत आगमन’ और अब हम आगे बढ़ते हैै '1765 – 1858 ई.