विदेशी प्रभुत्व के विरुध्द आंदोलन तीव्र गति से बढ़ने लगा। इस बीच विश्व-रंगमंच पर कुछ ऐसी घटनाएँ जिन्होंने भारतीयों की आँखे खोल दी। काँग्रेस ने अपना आंदोलन और तीव्र कर दिया। सन् 1914 के प्रथम विश्वयुध्द ने भारतवासियों की महत्वाकांक्षा को प्रगति प्रदान की। अँग्रेजो ने वर्तमान व्यवस्था में सुधार आवश्यलक समझा। सन् 1717 में भारत के नये राज्य-सचिव मिस्टर मांटेग्यू ने भारत में और भी अधिक सुधारों का समर्थन किया। उन्होंने घोषणा की कि भविष्य में प्रशासन की प्रत्येक शाखा में भारतीयों के साहचर्य को बढ़ाया जाय और ब्रिटिश साम्राज्य के विभिन्न भागों के रुप में उत्तरदायित्वपूर्ण शासंका विकास होता रहे। इसके बाद वे भारत आये और ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि लार्ड चेम्सफोर्ड के साथ देश भर दौरा कर राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन किया। उन्होंने 1918 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की जो ‘मान्ट्फोर्ड-योजना’ कहलायी।
1919 से 1946 ई. तक (स्वशासन का प्रारम्भ)
भारत सरकार अधिनियम, 1919 (मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट/सुधार)
1917 में तत्कालीन भारत के राज्य सचिव ‘मांटेग्यू’ ने भारत में और अधिक सुधारों का समर्थन किया। ‘मांटेग्यू’ स्वयं भारत आये तथा वायसराय (राज्य-प्रतिनिधि) ‘लार्ड चेम्सफोर्ड’ के साथ भारत का व्यापक दौरा कर यहाँ की जनता की पीड़ा एवं व्यथा को समझने का प्रयास किया।
इन दोनों द्वारा सन् 1918 में प्रस्तुत रिपोर्ट ‘मान्ट्फोर्ड-योजना’ के नाम से प्रकाशित की गई और इसी आधार पर ‘भारत सरकार अधिनियम, 1919’ (Indian Government Act, 1919) पारित किया गया।
1919 के अधिनियम के मुख्य उपबन्ध निम्नवत् थे -
इसने भारतीयों को अपना शासन स्वयं चलाने का अवसर प्रदान लिया जिस कारण इसे भारत में ‘स्वशासन’ की नींव का पत्थर माना जाता है।
इसने भारत में प्रांतीय सरकारों की स्थापना पर दोहरे शासन की शुरुवात की। द्वैध शासन प्रणाली को 1921 में गवर्नर के अधीन 9 प्रान्तों में लागु की गई।
द्वैध शासन प्रणाली 01 अप्रैल,1921 ई. को अन्तिम रुप से लागू की गई जो 01 अप्रैल,1937 तक चलती रही। परन्तु बंगाल में 1924 से 1927 तक और मध्य म्रान्त में 1924 से 1926 तक यह कार्य नहीं कर सकी।
द्वैध शासन (दोहरे शासन) को लागू करने का उद्देश्य भारतीयों को अपनी सरकार को स्वयं चलाने में प्रशिक्षण देना था।
इस अधिनियम के द्वारा भारतीयों को ‘डोमिनियन राज्य’ का दर्जा दिया गया।
इसके द्वारा विधि-निर्माण सम्बन्धी विषयों को दो भागों में वर्गीकृत किया गया – (1) केंद्रीय विषय, एवं (2) प्रान्तीय विषय।
केंद्रीय विषयों पर केंद्र सरकार एवं प्रान्तीय विषयों पर प्रान्तीय सरकारें विधि निर्माण कर सकती थीं। ठीक यही व्यवस्था वर्तमान भारतीय संविधान में अपनायी गई है।
प्रान्तीय विषयों को भी दो भागों में विभाजित किया गया था – (1) आरक्षित विषय, तथा (2) हस्तान्तरित विषय।
आरक्षित विषय अत्यधिक महत्व के थे, जैसे – पुलिस, न्याय, वित्त, सिंचाई, जेल आदि जबकि हस्तान्तरित विषय कम महत्व के थे, जैसे – शिक्षा, कृषि, स्थानीय स्वायत शासन आदि।
आरक्षित विषय विषयों का प्रशासन गवर्नर तथा उसकी परिषद् के सदस्यों के हाथों में था जो ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी थे। हस्तान्तरित विषयों का प्रशासन भारतीय मंत्रियों की सलाह से संचालित होता था।
यद्यपि इस अधिनियम द्वारा प्रान्तों में आंशिक उत्तरदायी सरकार की स्थापना की गई और दोहरे शासन की नींव रखी गईं, लेकिन यह दोहरी शासन व्यवस्था सफलता नहीं प्राप्त कर सकी क्योंकि भारतीयों की मांग पूर्ण स्वराज की थी।
1919 के अधिनियम के अन्य प्रमुख दोष थे –
उत्तरदायी सरकार की मांग पूरा न होना।
दोहरे शासन की असफलता।
साम्प्रदायिक निर्वाचन पध्दति का विस्तार।
जारी..
मिलते है हम अगले दिन, भारत सरकार अधिनियम, 1935 विषय पर चर्चा करने के लिये..
Thank you