कत्थक नृत्य

कथक नृत्य की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों का विचार है कि यह उत्तर भारत के मंदिरों के पुजारियों द्वारा महाकाव्य की कथा बांधते समय स्वांग और हाव भाव प्रदर्शित के फलस्वरुप विकसित होता गया ।

15 वीं एवं सोलहवीं शताब्दी में राधा कृष्ण उपाख्यानों या रासलीला की लोकप्रियता से कत्थक का और विकास हुआ। मुसलमान शासकों के काल में यह मंदिरों से निकलकर राज दरबारों में पहुंचा। जयपुर बनारस राजगढ़ तथा लखनऊ इस के मुख्य केंद्र थे लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के काल में कत्थक अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया।

20वीं सदी में लीला सूखे के प्रयासों से यह और अधिक लोकप्रिय हुआ। यह अत्यंत नियमबद्ध एवं शुद्ध शास्त्रीय नृत्य शैली है जिसमें पूरा ध्यान ले कर दिया जाता है।

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