छठी शताब्दी ईसापूर्व सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन

छठी शताब्दी ईसापूर्व में ब्राह्मणीय सामाजिक और धार्मिक दुर्व्यवस्था के खिलाफ मध्य गांगेय के क्षेत्र में जो सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन हुए थे उसके परिणाम स्वरुप लगभग 62 धार्मिक संप्रदायों का उदय हुआ था। जिसमें जैन और बौद्ध धर्म को अत्यंत ही लोकप्रिय धर्म साबित हुए परंतु इसका तात्पर्य यह नहीं था कि इन धर्मों के उदय का कारण मात्र तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक जीवन में अंतर व्याप्त दुर्बलता ही थी। अपितु उस समय की परिस्थितियों में लोहे के बड़े पैमाने पर प्रयोग के कारण जो नवीन आर्थिक परिस्थितियां बनी थी उसने भी इस आंदोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

स्पष्टत: चार वर्णों में विभाजित उत्तर वैदिक समाज में ब्राह्मण और क्षत्रियों को क्रमशः प्रथम और द्वितीय स्थान था । एक के हाथ में धार्मिक सत्ता थी तो दूसरे के हाथ में राजनीति था। क्षत्रिय इस बात से असंतुष्ट थे कि शासन का प्रधान होने के बावजूद उसका सामाजिक दर्जा ब्राह्मणों के नीचे था। इधर कृषि पशुपालन और व्यापार वाणिज्य में संलग्न रहने वाले और मुख्य करदाता वासियों को क्रम में तीसरा स्थान जब के ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करने वाले शूद्र चौथा स्थान प्राप्त था। व्यापार वाणिज्य में संलग्न नेता की वजह से वैश्य वर्ण की आर्थिक स्थिति काफी अच्छी हो गई थी ।इसीलिए वह भी एक बेहतर सामाजिक प्रतिष्ठा चाहते थे जबकि जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था में इस बात की गुंजाइश नहीं थी। शूद्रों की स्थिति काफी दयनीय थी और उस पर अनेक तरह की पात्रता लादी गई थी ।उस समय की सामाजिक व्यवस्था इस प्रकार की थी जो जितनी ऊंची जाति का होता था ।वह उतना ही शुद्ध समझा जाता था ।इस तनावपूर्ण सामाजिक वातावरण में ब्राह्मणों के अतिरिक्त अन्य सभी युवाओं असंतुष्ट थे ।क्योंकि बुद्ध और महावीर ने लोगों के सम्मुख अपेक्षाकृत एक समतामूलक समाज और कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था का आदर्श रखाऔर उन लोगो  को समर्थन मिला

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