सम्राट जयचंद्र का विवरण

जयचन्द कन्नौज साम्राज्य के राजा थे। वो गहरवार राजवंश से थे जिसे अब राठौड़ राजवंश के नाम से जाना जाता  है। दरअसल पृथ्वीराज और जयचंद की पुरानी दुश्मनी थी, दोनों के मध्य युद्ध भी हो चुके थे फिर भी पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता से शादी के बाद वह जयचंद का दामाद बन चुका था पृथ्वीराज चौहान का राजकुमारी संयोगिता का हरण करके कन्नौज से ले जाना राजा जयचंद को कांटे की तरह चुभ रहा था। उसके दिल में अपमान के तीखे तीर से चुभ रहे थे। वह किसी भी कीमत पर पृथ्वीराज का विनाश चाहता था। भले ही उसे कुछ भी करना पड़े। अपने जासुसों से उसे पता चला की मुहम्मद गौरी पृथ्वीराज से अपनी पराजय का बदला लेना चाहता है। बस फिर क्या था जयचंद को मनो अपने मन की मुराद मिल गयी।उसने गौरी की सहायता करके पृथ्वीराज को समाप्त करने का मन बनाया। जयचंद अकेले पृथ्वीराज से युद्ध करने का साहस नहीं कर सकता था। उसने सोचा इस तरह पृथ्वीराज भी समाप्त हो जायेगा और दिल्ली का राज्य उसको पुरस्कार सवरूप दे दिया जायेगा। राजा जयचंद के देशद्रोह का परिणाम यह हुआ की जो मुहम्मद गौरी तराइन के प्रथम युद्ध में अपनी हार को भुला नहीं पाया था, वह फिर पृथ्वीराज का मुकाबला करने के षड़यंत्र रचने लगा। राजा जयचंद ने दूत भेजकर गौरी को पृथ्वीराज के खिलाफ सैन्य सहायता देने का आश्वासन दिया। देशद्रोही जयचंद की सहायता पाकर गौरी तुरंत पृथ्वीराज से बदला लेने के लिए तैयार हो गया।

जब पृथ्वीराज को ये सुचना मिली की गौरी एक बार फिर युद्ध की तैयारियों में जुटा हुआ तो उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मुहम्मद गौरी की सेना से मुकाबल करने के लिए पृथ्वीराज के मित्र और राज कवि चंदबरदाई ने अनेक राजपूत राजाओ से सैन्य सहायता का अनुरोध किया परन्तु संयोगिता के हरण के कारण से राजपूत राजा पृथ्वीराज के विरोधी बन चुके थे वे कन्नौज राजा के संकेत पर गौरी के पक्ष में युद्ध करने के लिए तैयार हो गए।

1192 ई० में एक बार फिर पृथ्वीराज और गौरी की सेना तराइन के क्षेत्र में युद्ध के लिए आमने सामने खड़ी थी। दोनों और से भीषण युद्ध शुरू हो गया। इस युद्ध में पृथ्वीराज की और से 3 लाख सेनिकों ने भाग लिया था जबकि गौरी के पास एक लाख बीस हजार सैनिक थे। गौरी की सेना की विशेष बात ये थी की उसके पास शक्तिशाली घुड़सवार दस्ता था। पृथ्वीराज ने बड़ी ही आक्रामकता से गौरी की सेना पर आक्रमण किया। उस समय भारतीय सेना में हाथी के द्वारा सैन्य प्रयोग किया जाता था। गौरी के घुड़सवारो ने आगे बढकर राजपूत सेना के हाथियों को घेर लिया और उनपर तीर वर्षा शुरू कर दी। घायल हाथी न तो आगे बढ़ पाए और न पीछे बल्कि उन्होंने घबरा कर अपनी ही सेना को रोंदना शुर कर दिया। तराइन के द्वितीय युद्ध की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी की देशद्रोही जयचंद के संकेत पर राजपूत सैनिक अपने राजपूत भाइयो को मार रहे थे। दूसरा पृथ्वीराज की सेना रात के समय आक्रमण नहीं करती थी (यही नियम महाभारत के युद्ध में भी था) लेकिन तुर्क सैनिक रात को भी आकर्मण करके मारकाट मचा रहे थे ।

परिणामस्वरूप इस युद्ध में पृथ्वीराज की हार हुई और उसको तथा राज कवि चंदबरदाई को बंदी बना लिया गया।जयचंद को यह विश्वास था कि पृथ्वीराज को पराजित करने के उपरांत मोहम्मद गोरी वापस चला जाएगा परंतु ऐसा नहीं हुआ और मोहम्मद गोरी ने कन्नोज पर आक्रमण कर दिया| इस आक्रमण के फलस्वरुप 1194 ईसवी में चंदावर के मैदान में जयचंद तथा गोरी के बीच में संघर्ष हुआ| मोहम्मद गोरी के सेनापति कुतूबुद्दीन ने बहुत ही कुशल युद्ध नीति का प्रयोग किया और उसके द्वारा चलाए गए बाणों से जयचंद की आंखें फूट गई| आँख फूट जाने के कारण जयचंद्र हाथी से गिर पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई|

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