शेरशाह सूरी के पिता का नाम हसन खाँ था जौनपुर के एक छोटे से जागीरदार थे।ये मूल से अफगानी थे।दक्षिण बिहार के सूबेदार बहार खाँ लोहानी ने शेरशाह सूरी को शेर खाँ की उपाधि से नवाजा था।यह उपाधि शेरशाह सूरी द्वारा शेर को मार गिराने के कारण दी गयी थी।साथ ही बहार खाँ लोहानी ने शेरशाह सूरी को अपने पुत्र जलाल खाँ का संरक्षक भी नियुक्त किया। बहार खाँ लोहानी की मृत्यु के पश्चात शेर खां ने बहार खाँ की विधवा दूदू बेगम से विवाह कर लिया था ।
शेरशाह सूरी ने 1529 ई० में बंगाल के शासक नुसरत शाह को युद्ध में हराकर ‘हजरत अली‘ की उपाधि धारण की थी।1530 ई० में चुनार के किले पर कब्ज़ा किया और ताज खाँ की विधवा लड़मलिका से विवाह किया।साथ ही किले से काफी दौलत भी प्राप्त की।1539 ई० मुग़ल साम्राज्य के शासक हुमायूँ और शेरशाह सूरी के बीच चौसा का युद्ध हुआ जिसमें हुमायूँ को पराजित होना पड़ा,दीवान-ए-वजारत – इस विभाग का अध्यक्ष वजीर (मुख्य मंत्री ) था। वह साम्राज्य की आय-व्यय तथा अन्य विभागों की देखभाल करता था। वजीर का महत्त्व सुल्तान के बाद था।दीवान-ए-आरिज (युद्ध विभाग) – इस विभाग का अध्यक्ष ‘आरिज-ए-मुमालिक’ कहलाता था। वह सेना की भर्ती अनुशासन तथा नियंत्रण कार्य करता था तथा वेतन वितरण का प्रबंध भी उसी के हाथ में था। शेरशाह स्वयं इस विभाग में बड़ी रूचि लेता था।
1540 ई० को बिलग्राम (कन्नौज) में हुमायूँ और शेरशाह के बीच युद्ध हुआ था, जिसमें हुमायूँ को हार का सामना करना पड़ा और दिल्ली पर फिर से अफगानों का शासन स्थापित हुआ।दिल्ली पर कब्ज़ा करने के बाद शेरशाह ने दूसरे अफगान साम्रज्य या कहा जाये कि सूर वंश की स्थापना की।इसके बाद शेरशाह सूरी ने 1544 ई० में मारवाड़ पर आक्रमण किया उस समय वहां का राजा मालदेव था।इस युद्ध में राजपूत गयता और कुप्पा ने शेरशाह सूरी की अफगानी सेना के पसीने छुड़ा दिये। इस घटना ने शेरशाह सूरी को काफी प्रभावित किया।इस युद्ध के कुछ समय बाद शेरशाह सूरी ने कालिंजर के किले पर आक्रमण किया जो उस समय राजा किरात सिंह के अधिकार में था। इसी समय ‘उक्का‘ नाम की तोप चला रहा था कि तभी एक गोला आकर पास पड़े बारूद के ढेर पर जा गिरा और विस्फोट के कारण शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गयी।शेरशाह को सासाराम, बिहार में दफनाया गया जहाँ शेरशाह का मकबरा बनवाया गयाशेरशाह सूरी की मृत्यु के पश्चात लगभग 1555 ई० तक दिल्ली पर सुर वंश के शासकों का अधिकार रहा ।