क्रमशः ...
Day- 70
- भारतीय संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 में ‘मौलिक अधिकार’ या ‘मूल अधिकार’ का वर्णन किया गया है। मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे। छठे मौलिक अधिकार ‘सम्पत्ति का अनिवार्य अर्जन’ को संविधान (44वें संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 6 के द्वारा 20 जून, 1979 से मौलिक अधिकारों से हटा दिया गया।
- ‘सम्पत्ति का अनिवार्य अर्जन’ मौलिक अधिकार नहीं होकर वर्तमान में सामान्य विधिक अधिकार (Leagal Rights) है जिसे अनुच्छेद 300-ए में स्थान दिया गया है।
- मूल अधिकार नौसर्गिक अधिकार हैं जिसका उद्गम नैसर्गिक विधि के सिध्दांतों से हुआ है। नैसर्गिक अधिकारों का सम्मान अधिक है। इसके पीछे कारण यह है कि नैसर्गिक अधिकारों की विद्यमानता किसी अधिनियम पर आधारित नहीं है।
- भारतीय संविधान में मूल अधिकारों की कोई परिभाषा नहीं दी गई किन्तु संविधान के भाग-3 (मौलिक अधिकार) को ‘भारत का अधिकार-पत्र’ (Magna Carta) कहा जाता है।
- मौलिक अधिकार वे अधिकारभूत अधिकार हैं जो नागरिकों के बौध्दिक, नैतिक और अध्यात्मिक विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक ही नहीं वरन् अपरिहार्य हैं। इन अधिकारों के अभाव में व्यक्ति का बहुमुखी विकास सम्भव नहीं है।
- मौलिक अधिकार न्याय-योग्य होते हैं अर्थात् न्यायापालिका मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए हर सम्भव उपाय करती है।
- यदि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार का हनन होता है तो ऐसी स्थिती में व्यक्ति उच्चतम न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय की शरण ले सकता है।
- मौलिक अधिकार आत्यान्तिक अधिकार नहीं है। इन अधिकारों के प्रयोग पर युक्तियुक्त निर्बन्ध लगाये जा सकते हैं। कुछ दशाओं में नागरिकों के मौलिक अधिकारों को निर्बन्धित अथवा निलम्बित किया जा सकता है।
- निम्नलिखित परिस्थितियों में नागरिकों के मूल अधिकारों को निर्बन्धित अथवा निलम्बित किया जा सकता है –
- प्रतिरक्षा सेना के सदस्यों के सम्बंध में (अनुच्छेद 33)
- जब सैनिक विधि लागू हो (अनुच्छेद 34)
- आपात उद्घोषणा के अधीन (अनुच्छेद 352)
- संविधान में संशोधन द्वारा (अनुच्छेद 368)
मिलते है हम अगले दिन, नये अधिकार या मौलिक अधिकार विषय पर फिर आगे चर्चा करने के..