बौद्व धर्म (प्राचीन भारतीय इतिहास-30)

      बुद्व ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ (ऋषिपत्तन भृगदाव) में दिया जिसे बौद्व ग्रन्थों में धर्मचक्र प्रर्वतन कहा गया।

      बुद्ध को गया मंे पीपल वृक्ष के नीचे वैशाख पूर्णिमा के दिन सम्बोधि (ज्ञान) प्राप्त हुआ। बुद्ध को तथागत भी कहा जाता है।

      कौशल के राजा प्रसेनजित बुद्ध के समान आयु के थे।

      वैशाली में वुद्ध ने आनन्द के कहने पर स्त्रियों को संघ में प्रवेश की अनुमति दी और भिक्षुणीसंघ का निर्माण किया। संघ में प्रवेश पाने वाली पहली महिला प्रजापति गौतमी थी।

      बुद्ध ने अंगुलिमाल नामक डाकू को भी बौद्व धर्म शिक्षित किया था।

      बुद्व ने अपने उपदेश जन साधारण की भाषा पाली में दिये ।

      बुद्व ने अपना सर्वाधिक उपदेश कोशल की राजधानी श्रावस्ती में दिये।

      4830पू0 में बुद्व की मृत्यु 80 वर्ष की अवस्था में कुशीनारा (कुशीनगर) में चन्द्र नामक लोहार द्वारा दिये गये भोजन के बाद हो गयी। जिसे बौद्व धर्म में महापरिनिर्वाण कहा गया है। यही बुद्ध ने सुभद्द को अपना अन्तिम उपदेश दिया।

      बौद्ध धर्म अनीश्वर वादी है। यह आत्मा को स्वीकार नही करता है। बौद्व धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है। तृष्णा को समाप्त हो जाने की अवस्था को बुद्व ने निर्वाण कहा है।

      बौद्ध धर्म के मूलाधार चार आधार सत्य है। ये है-1. दुख 2. दुख समुदाय 3. दुख निरोध 4. दुख निरोध गामिनी प्रतिपदा। अष्टांगिक मार्ग भी कहते हैं। इसका उल्लेख तैत्तिरीय उपनिषद में मिलता है।

-शेष अगले भाग में

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