Day- 71
मूल अधिकार राज्य के विरुध्द सरक्षण है
जैसा कि मूल अधिकार के अध्याय के प्रारम्भ में कहा गया है, मूल अधिकारों का जन्म ही जनता और राज्य-शक्ति के बीच संघर्ष का परिणाम है। व्यक्ति अपने अधिकारों की सांविधानिक सुरक्षा राज्य-शक्ति के विरुध्द ही आवश्यक समझाता है। राज्य-शक्ति के समक्ष वह कमजोर होता है। भारतीय संविधान, भाग-3 द्वारा प्रदत्त अधिकार राज्य-शक्ति के विरुध्द गारण्टी किये गये हैं न कि सामान्य व्यक्तियों के अवैध कृत्यों के विरुध्द। व्यक्तियों के अनुचित कृत्यों के विरुध्द साधारण विधि में अनेक उपचार उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त वह दूसरे व्यक्ति के विरुध्द उतना असहाय और अशक्त नहीं होता है जितना कि राज्य-शक्ति के विरुध्द। पी० डी० शामदासिनी बनाम सेण्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया (ए० आई० आर० 1952 एस० सी० 59) के मामले में सेण्ट्रल बंक के कर्मचारियों ने पने एक कर्मचारी की सम्पत्ति जब्त करने का आदेश जारी किया। कर्मचारी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय में एक याचिका प्रस्तुत की जिसमें उसने यह कहा कि बैंक के कार्यों के फलस्वरूप वह अनुच्छेद 19 और 31 में दिए गये अपने सम्पत्ति के अधिकार से वंचित किया जा रहा है; अतः न्यायालय को समुचित लेख जारी करके बैंक को ऐसा करने से रोकना चाहिये। न्यायालय ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया और यह अभिनिर्धारित किया अनुच्छेद 19 और 31 में निहित संरक्षण व्यक्तियों के अनुचित कार्यो के विरुध्द नहीं है वरन् राज्य-शक्ति के विरुध्द उपलब्ध है। किसी अन्य व्यक्ति द्वारा मूल अधिकारों के उल्लंघन करने के विरुध्द उपचार साधारण विधि में खोजे जाने चाहिए, संविधान में नहीं। चूँकि सेण्ट्रल बैंक एक प्राइवेट व्यक्ति है; अतः उसके कार्यो के विरुध्द उपचार साधारण विधि में खोजा जाना चाहिए। किन्तु यदि किसी व्यक्ति का कार्य राज्य द्वारा समर्थित है तो उस कार्य की संवैधानिकता को चुनौती दे सकता है।