मथुरा कला शैली

मौर्योत्तर काल में भारतीय  मूर्ति कला के रूप में मथुरा कला शैली का भी व्यापक विकास हुआ दिखता है। इस शैली के मूर्तिकारों ने विभिन्न देसी परंपराओं के सम्मिश्रण से इस कला शैली को जन्म दिया सेवक यच पशु तथा पक्षी के साथ कुबेर की पूजा वृक्ष तथा पुष्प कलिका आएं और बुद्ध तथा बोधिसत्व की पूजा के दृश्य के माध्यम से इसे भली-भांति समझा जा सकता है अथवा कला के तहत मूर्तिकारों ने सुंदर प्रतिमाओं का निर्माण किया उसके विषय में जैन बौद्ध के साथ-साथ ब्राह्मण धर्म तथा नाग पूजा आदि भी शामिल थे।

मथुरा कला का भारतीय स्वरूप जंगलों तथा व्यक्तियों को दर्शाने में प्रकट हुआ है इस काल में नारी मूर्ति को पेड़ों के पास या छज्जे  पर और बहुधा किसी मुंह के बल पड़े बने पर खड़ी दिखाई गई है।

इस कला में पहली बार राजा को खड़ी अवस्था में दिखाया गया है इसका दाया हाथ एक गधा पर टिका है तथा बाया हाथ तलवार की पेटी पर रखा हुआ है।

जिसमें राजा को सिंहासन पर बैठा दिखाया गया है तथा उसके सामने सिंघो की मूर्तियां बनाई गई हैं मथुरा कला में बुद्ध तथा जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों का सादृश्य ब्राम्हण धर्म तथा नाग पूजा से जुड़ी मूर्तियों का भी भरपूर निर्माण हुआ।

इसमें शिवलिंग का भी निर्माण किया गया है तथा इसके ऊपर लेख भी अंकित किया गया है। विष्णु की एक अष्टभुज प्रतिमा लक्ष्मी के साथ कमल पर विराजमान मिली है कुबेर के साथ राजलक्ष्मी और वसुंधरा कात्यायनी ,महिषासुर ,मर्दिनी तथा सप्त मातृकाओं का भी चित्रण मथुरा कला में किया गया है।

मथुरा कला में नग्नता श्रंगार नृत्य तथा संगीत सभी भाव का इमानदारी से चित्रण किया गया है। कला कि यह शैली गुप्तकाल में तथा उसके बाद भी जारी रही।

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