बैरम खाँ (१५०१-१५६१)

बैरम खाँ खान-ए-खाना की उपाधि से सम्मानित थे। वे हुमायूँ के साढ़ू और अंतरंग मित्र थे। रहीम की माँ वर्तमान हरियाणा प्रांत के मेवाती राजपूत जमाल खाँ की सुंदर एवं गुणवती कन्या सुल्ताना बेगम थी। जब रहीम पाँच वर्ष के ही थे, तब गुजरात के पाटन नगर में सन १५६१ में इनके पिता बैरम खाँ की हत्या कर दी गई। रहीम का पालन-पोषण अकबर ने अपने धर्म-पुत्र की तरह किया।मध्य कालीन युद्धों के अरबी इतिहास ग्रंथ के प्रथम अध्याय में बैरम खां द्वारा बनवाई गई `कल्ला मीनार' का उल्लेख है। इस स्थान का नाम सर मंजिल रखा गया था। सिकंदर शाह सूरी के साथ लड़ने में जितने सिर कटे थे या सैनिक मरे थे, उन्हें बटोर कर उन्हें ईंट, पत्थरें की जगह काम में लाया गया और यह ऊंची मीनार खड़ी की गई थी। मुगल बादशाहों ने और भी कितनी ही ऐसी कल्ला मीनारें युद्ध विजय के दर्प-प्रदर्शन के लिए बनवाई थीं। कल्ला, फारसी में सिर को कहते हैं।बैरम ख़ाँ हुमायूँ का सहयोगी तथा उसके नाबालिग पुत्र अकबर का वली अथवा संरक्षक था। वह बादशाह हुमायूँ का परम मित्र तथा सहयोगी भी था। अपने समस्त जीवन में बैरम ख़ाँ ने मुग़ल साम्राज्य की बहुत सेवा की थी।बैरम ख़ाँ का सम्बन्ध तूरान (मध्य एशिया) की तुर्कमान जाति से था। हैदराबाद के निज़ाम भी तुर्कमान थे। इतिहासकार कासिम फ़रिश्ता के अनुसार वह ईरान के कराकुइलु तुर्कमानों के बहारलु शाखा से सम्बद्ध था।बैरम ने 16 साल की उम्र में बाबुर की सेवा में प्रवेश किया और भारत के शुरुआती मुगल विजयों में सक्रिय भूमिका निभाई। बाद में बैरम खान ने हुमायूं के अधीन मुगल साम्राज्य की स्थापना के लिए काफी योगदान दिया ।

1556 में हुमायूं की मृत्यु के बाद, बैरम खान को युवा राजकुमार अकबर पर रीजेंजर नियुक्त किया गया रीजेन्ट के तौर पर, उन्होंने उत्तर भारत में मुगल अधिकार को समेकित किया और सबसे ज्यादा उल्लेखनीय रूप से पानीपत की दूसरी लड़ाई में मुगल सेना का नेतृत्व किया, जो नवंबर 1556 में अकबर और हेमू के बीच लड़ा गया था।बैरम खान एक शिया मुस्लिम थे और उन्हें सुन्नी तुर्क नेताओं से नापसंद किया गया था।


 
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