गाजी मलिक का दूसरा नाम ग्यासुद्दीन तुगलक था गाजी का अर्थ होता है – “काफिरों का संहारक” । दिलली सल्तनत पर शासन करने वाला यह तीसरा वंश था ।गयासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली के निकट तुग़लक़ाबाद नामक नगर की स्थापना की ।फरिश्ता के अनुसार, गाजी मलिक के पिता कुतुलुग गाजी थे बाद में कुतुलुग शब्द अपभ्रंश होते-होते तुगलक हो गया और ये अपने नाम के आगे तुगलक लिखने लगे ।ग्यासुद्दीन तुगलक दिन में दो बार सुबह-शाम दरबार लगाता था ।ग्यासुद्दीन तुगलक ने असैनिक पदाधिकारियों को जागीर देने की प्रथा पुन: शुरु की ।अमीर खुसरो के अनुसार, ग्यासुद्दीन तुगलक एक विद्वान शासक था ।सुल्तान बनने के पहले गयासुद्दीन खिलजी वंश के अंतिम शासक कुतबुद्दीन मुबारक शाह खिलजी के शासनकाल में उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रांत का शक्तिशाली गवर्नर हुआ करता था।गयासुद्दीन ने अपनी आर्थिक नीति का आधार संयम, सख्ती और नरमी का संतुलन बनाया, जिसे रस्म-ए-मियान अर्थात 'मध्यपंथी नीति कहा गया। गयासुद्दीन ने मध्यवर्ती जमींदारों, विशेष रूप से मुकद्दम तथा खूतों को उनके पुराने अधिकार लौटा दिए। उसने अमीरों की भी भूमि पुन: लौटा दी। वह दानी स्वभाव का होने के साथ जनकल्याणकारी कार्यों को कराने में दिलचस्पी रखता था। उसने लगान के रूप में उपज का 1/10 या 1/12 हिस्सा ही लेने का आदेश जारी कराया।उसने सिंचाई के लिए कुओं एवं नहरों का निर्माण करवाया। सम्भवत: नहर का निर्माण करवाने वाला वह प्रथम सुल्तान था। गयासुद्दीन की डाक व्यवस्था बहुत श्रेष्ठ थी। न्याय व्यवस्था के अन्तर्गत उसने एक न्याय विभाग का निर्माण करवाया।बरनी के अनुसार सुल्तान अपने सैनिकों के साथ पुत्रवत व्यवहार करता था। उसकी सेना में गिज, तुर्क, मंगोल, रूमी, ताजिक, खुरासानी, मेवाती एवं दोआब के राजपूत सैनिक शामिल थे।
गयासुद्दीन ने 1321 ई. में वारंगल पर आक्रमण किया, लेकिन वहां के काकतीय राजा प्रताप रुद्रदेव को पराजित करने में असफल रहा।गयासुद्दीन ने 13२३ ई में द्वितीय अभियान के अन्तर्गत शाहजादे 'जौना खां (मुहम्मद बिन तुगलक) को दक्षिण भारत में सल्तनत के प्रभुत्व की पुन:स्थापना के लिए भेजा।गयासुद्दीन के भतीजे जौना खां जो बाद में मुहम्मद तुगलक के नाम से प्रसिद्ध हुआ उसने वारंगल के काकतीय एवं मदुरा के पाण्ड्य राज्यों को जीतकर दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया। इस प्रकार गयासुद्दीन के समय में ही सर्वप्रथम दक्षिण के राज्यों को दिल्ली सल्तनत में मिलाया गया।जब ग़यासुद्दीन तुग़लक़ बंगाल अभियान से लौट रहा था, तब लौटते समय अफ़ग़ानपुर में एक महल में सुल्तान ग़यासुद्दीन के प्रवेश करते ही वह महल गिर गया, जिसमें दबकर उसकी मार्च, 1325 ई. को मुत्यृ हो गयी।