हाइपरसोनिक मिसाइल........

चीनी रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार देश की नई हाइपर सोनिक बैलिस्टिक मिसाइल डीएफ-17 अमरीका तक मार कर सकती है. 12,000 किलोमीटर दूर तक मार कर सकने वाली डीएफ-17 अमरीका में कहीं भी एक घंटे में पहुंच सकती है.

ये वायुमंडल में निचले स्तर पर उड़ती है और इस कारण इसे इंटरसेप्ट करना भी आसान नहीं होगा. इसी हफ़्तेसाउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में छपी ख़बर के अनुसार मकाऊ में मौजूद रक्षा विशेषज्ञ एंटनी वांग डोंग मानते हैं कि ये अमरीकी एंटी मिसाइल थाड सिस्टम को नाकाम करते हुए अपना काम कर सकती है.

इससे पहले द डिप्लोमैट के अनुसार चीन अब तक ऐसे दो परीक्षण कर चुका है. चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने नवंबर में ऐसे रॉकेट्स का परीक्षण किया था जो 7680 मील प्रति घंटे तेज़ चल सकते हैं. इस सिस्टम को बैलिस्टिक मिसाइलों जैसे डीएफ-17 को ले जाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

क्या चीन की ये उपलब्धि ख़तरनाक हो सकती है?बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने बात की रक्षा विशेषज्ञ और सोसायटी फॉर पॉलिसी स्टडीज़ से जुड़े कोमोडोर उदय भास्कर से. पढ़िए उनका नज़रिया-

Image copyrightROLEX DELA PENA - POOL /GETTY IMAGESचीन मिसाइल

क्या है हाइपरसोनिक बैलिस्टिक मिसाइल?

ये एक नए प्रकार का हाइपर सोनिक ग्लाइड मिसाइल होता है जिसकी ख़ास बात ये है कि इसमें क्रूज़ मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल दोनों की ही खूबियां शामिल होती हैं.

बैलिस्टिक मिसाइल धरती के वायुमंडल से बाहर जा कर एक पैराबोलिक पाथ में जाती है और फिर से धरती के वायुमंडल में आ जाती है.

ये 3000 से 7000 किलोमीटर दूरी तक जा सकती है. इसे हाइपरसोनिक एचजीवी भी कहा जाता है.

Image copyrightROLEX DELA PENA - POOL /GETTY IMAGESचीन की सामरिक शक्ति

क्या इससे भारत को ख़तरा है?

कहा जा रहा है कि इस मिसाइल की जद में अमरीका भी है तो ऐसे में भारत भी इसकी जद में आ सकता है.

लेकिन चीन ने अब तक जो जानकारी दी है उसके अनुसार ये अब तक 3000 किलोमीटर तक सटीक मार कर सकती है.

हाइपर सोनिक एचजीवी आम मिसाइलों की तरह नहीं चलती है बल्कि वायुमंडल में काफी निचले स्तर पर चलती है.

इस कारण इसकी मारक क्षमता बढ़ जाती है. और यही कारण है कि ये एंटी मिसाइल सिस्टम के लिए चुनौती पेश कर सकती है.

Image copyrightMISSILE DEFENSE AGENCY/HANDOUT VIA REUTERSअमरीका का थाड

Image captionअमरीका का थाड मिसाइल डिफेंस सिस्टम जो दक्षिण कोरिया में लगाया गया है

विश्व के लिए ख़तरा, लगनी चाहिए पाबंदी

बैलिस्टिक मिसाइल को रोकने के लिए शक्तिशाली देशों ने मिसाइल डिफ़ेंस बनाया है.

लेकिन एचजीवी को इससे रोकना काफ़ी कठिन होगा. लेकिन जिस तरह तकनीक आगे बढ़ रही है उस दिशे में भी काम ज़रूर होगा.

फिलहाल तीन देशों- अमरीका, रूस और चीन के पास ही के पास ही एचजीवी की क्षमता है. अब देखना ये है कि इन तीन देशों में कोई सहमति बनती है या नहीं.

ये मिसाइल एक तरह से मिसाइल डिफेंस सिस्टम के ख़िलाफ़ यानी उसे नज़रअंदाज़ करते हुए काम करते हैं.

इस कारण से ये स्थायित्व के ख़िलाफ़ होते हैं और इसीलिए पिछले शीतयुद्ध के समय पर शक्तिशाली देशों ने इसके बारे में चेतावनी दी है कि जो क्षमता डिफ़ेंस को नाकाम करे उस तरकह की तकनीक पर पाबंदी होनी चाहिए.

इसी के मद्देनज़र सोवियत संघ और अमरीका ने एक ऐंटी बेलिस्टिक मिसाइल समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

हालांकि अभी इस पर जल्दबाज़ी नहीं होनी चीहिए लेकिन चीन के पास ये क्षमता आने के बाद इस पर विचार ज़रूर होना चाहिए.

Image copyrightREUTERS/ROLEX DELA PENA/POOLसाउथ चाइना सी

Image captionचीन विवादित साउथ चाइना सी इलाक़े में कई कत्रिम द्वीप बना रहा है जिन पर अमरीका आपत्ति जता चुका है

अमरीका चीन का तनाव

अमरीका ने उत्तर कोरिया के लगातार परमाणु परीक्षणों के कारण दक्षिण कोरिया में अपना थाड एंटी मिसिइल सिस्टम लगाया है.

अमरीका के अनुसार किसी ख़तरे की सूरत में इनके इस्तेमाल उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ किया जा सकता है.

चीन के साथ दक्षिण चाइना सी को ले कर पहले से ही वो नाराज़ है और हाल में उनसे चीन पर आरोप लगाया है कि वो उत्तर कोरिया को परमाणु कार्यक्रम रोकने के लिए नहीं मना पाया है.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने हाल में नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटिजी में कहा है कि वो चीन से असंतुष्ट हैं.

लेकिन मौजूदा स्थिति में चीन के एचजीवी परीक्षण का असर तुरंत नहीं होगा. लेकिन अमरीका और चीन के बीच जो तनाव है वो धीरे-धीरे बढ़ रहा है.

Image copyrightFENG LI/GETTY IMAGESचीनी मिसाइल

शुरू हो गई है आर्म्स रेस

चीन के दिखा दिया है कि उसके पास अब वो क्षमता है जिसके बारे में पहले ये माना जाता था कि ये केवल अमरीका और रूस के पास है.

चीन इस ख़ास क्लब का तीसरा मेंबर बन गया है. भारत ने हाल में जो ब्रह्मोस बनाया था वो एक हाइपर सोनिक क्रूज़ मिसाइल है.

चीन ने अब जो बनाया वो हाइपर सोनिक बैलिस्टिक मिसाइल है. चीन-अमरीका-रूस के बीच एक तरह से एक आर्म्स रेस शुरू हो गई है.

चीन अमरीका से चिंतित है, अमरीका रूस की परमाणु क्षमता से चिंतित है और रूस चीन के उभरते हुए स्वरूप से चिंतित है.

ये एक अजीब प्रकार का त्रिकोण बना है और मुझे नहीं लगता है कि इन तीनों के बीच इसे ले कर कोई आम सहमति बन सकती है.

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