कुमारगुप्त की मृत्यु के पश्चात स्कंदगुप्त सिंहासन पर बैठा। स्कंदगुप्त ने 12 वर्ष तक शासन किया। स्कन्दगुप्त ने विक्रमादित्य, क्रमादित्य आदि उपाधियाँ धारण कीं। कहीय अभिलेख में स्कन्दगुप्त को शक्रोपन कहा गया है।स्कन्दगुप्त एक अत्यन्त लोकोपकारी शासक था जिसे अपनी प्रजा के सुख-दुःख की निरन्तर चिन्ता बनी रहती थी। जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि स्कन्दगुप्त के शासन काल में भारी वर्षा के कारण सुदर्शन झील का बाँध टूट गया था उसने दो माह के भीतर अतुल धन का व्यय करके पत्थरों की जड़ाई द्वारा उस झील के बाँध का पुनर्निर्माण करवा दिया।शिलालेखों में कहा गया है कि गांधार में स्कंदगुप्त का हूणों के साथ इतना भयंकर संग्राम हुआ कि संपूर्ण पृथ्वी काँप उठी। इस महासंग्राम में विजयश्री ने स्कंदगुप्त का वरण किया। इसका शुभ्र यश कन्याकुमारी अंतरीप तक छा गया। बौद्ध ग्रंथ 'चंद्रगर्भपरिपृच्छा' में वर्णित है कि हूणों की सैन्यसंख्या तीन लाख थी और गुप्त सैन्यसंख्या दो लाख थी, किंतु विजयी हुआ गुप्त सैन्य। इस महान् विजय के कारण गुप्तवंश में स्कंदगुप्त 'एकवीर' की उपाधि से विभूषित हुआ। इसने अपने बाहुबल से हूण सेना को गांधार के पीछे ढकेल दिया। स्कंदगुप्त के समय में गुप्तसाम्राज्य अखंड रहा। इसके समय की कुछ स्वर्णमुद्राएँ मिली हैं, जिनमें स्वर्ण की मात्रा पहले के सिक्कों की अपेक्षा कम है। इससे प्रतीत होता है कि हूणयुद्ध के कारण राजकोश पर गंभीर प्रभाव पड़ा था इसने प्रजाजनों की सुख सुविधा पर भी पूरा पूरा ध्यान दिया। 461 ई. के कहोम स्तम्भ लेख में गुप्तकालीन शान्ति की अवस्था का वर्णन है। इस समय तक गुप्त साम्राज्य विदेशी आक्रमणकारियों के भय से पूर्णतः मुक्त हो चुका था। इतिहासकारों के मध्य यह विवाद का विषय बना हुआ है कि स्कन्दगुप्त साम्राज्य की सुरक्षा प्रदान कर पाया अथवा नहीं। कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि इन युद्धों ने गुप्त साम्राज्य को जर्जरित कर दिया तथा स्कन्दगुप्त के समय से ही गुप्तों के साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हो गया। यह धारणा युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होती क्योंकि स्कन्दगुप्त ने अपने अन्तिम समय तक उत्तराधिकार में प्राप्त गुप्त साम्राज्य को अक्षुण रखा।स्कन्दगुप्त की सफलताओं का आधार उसकी प्रशासनिक व्यवस्था थी। उसने पश्चिमोत्तर सीमा का पूरा महत्त्व समझा और उसकी रक्षा का समुचित प्रबन्ध किया। स्कन्दगुप्त का साम्राज्य पश्चिम में सौराष्ट्र (काठियावाड़) से लेकर पूर्व में बंगाल और उत्तर भारत के मध्यप्रदेश तक फैला हुआ था। वह एक विशाल साम्राज्य का मालिक था। उसका साम्राज्य विभिन्न प्रान्तों में विभाजित था। इसने राज्य की आभ्यंतर अशांति को दूर किया और हूण जैसे प्रबल शत्रु का मानमर्दन करके 'आसमुद्रक्षितीश' पद की गौरवरक्षा करते हुए साम्राज्य में चर्तुदिक् शांति स्थापित की। स्कंदगुप्त की कोई संतान नहीं थी। अत: इसकी मृत्यु के पश्चात् पुरुगुप्त सम्राट् बना।