- प्राचीन स्मारकों की रक्षा सम्बन्धी निर्देशक तत्व:- इन तत्वों द्वारा प्राचीन स्मारकों, कलात्मक महत्व के स्थानों और राष्ट्रीय महत्व के भवनों की रक्षा का कार्य भी राज्य को सौंपा गया है। राज्य का कर्तव्य निश्चित किया गया है कि वह प्रत्येक स्मारक, कलात्मक या ऐतिहासिक रुचि के स्थानों को, जिसे संसद ने राष्ट्रीय महत्व का घोषित कर दिया हो, रक्षा करने का प्रयत्न करेगा।
42वें संवैधानिक संशोधन में कहा गया है कि राज्य ’देश के पर्यावरण
(Environment) की रक्षा और उसमें सुधार का प्रयास करेगा। (अनुच्छेद 48’A’)
- अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा सम्बन्धी तत्व:-हमारे देश का आदर्श सदैव ही ’वसुधैव कुटुम्बकम्’का रहा है और हमने सदैव ही शान्ति तथा ’जीओ और जीने दो’ के सिद्धान्त को अपनाया है। इसी आदर्श को हमारे संविधान के अन्तिम निर्देशक तत्व में इस प्रकार बताया है:
राज्य अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में निम्नलिखित आदर्शों को लेकर चलने का प्रयत्न करेगा:
(अ) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा में वृद्धि,
(ब) राष्ट्रों के बीच न्याय और सम्मानूपूर्ण सम्बन्ध स्थापित रखना,
(स) राष्ट्रों के आपसी व्यवहार में अन्तर्राष्ट्रीय कानून और सन्धियों के प्रति आदर का भाव बढ़ाना,
(द) अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को मध्यस्थता द्वारा सुलझाने के लिए प्रोत्साहित करना।
निर्देशक तत्वों के इस वर्णन के आधार पर कहा जा सकता है कि इन तत्वों के आधार पर भारत में वास्तविकता प्रजातन्त्र की स्थापना हो सकेगी और हमारा देश एक ऐसा लोककल्याणकारी राज्य बन सकेगा जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को स्वतन्त्रता, समता तथा सामाजिक न्याय प्राप्त हो सके।