अद्योगीकरण के साथ साथ भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि पर अधिकाधिक निर्भर होने लगी और भूमि पर दबाव पड़ने लगा। जनसंख्या के कृषि पर अधिकाधिक निर्भर होने के फलस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिली अर्थात कृषि पर आधारित कच्चे माल का अधिकाधिक उत्पादन। भारत में कृषि के साधनों का इस प्रकार विकास किया गया कि भारत औद्योगिक इंग्लैंड के लिए कृषि पर आधारित कच्चे माल का उत्पादन करने वाला क्षेत्र बन जाए। आगे चलकर यह महसूस किया गया कि भारत का कच्चा माल उच्च कोटि का नहीं है, अतः इस त्रुटि को सुधारने के लिए अंग्रेज भूमिपतियों को भारत में बसने और कृषि कार्यों में लगने की अनुमति दी गई। इस अनुमति से पूर्व 1813 के चार्टर एक्ट द्वारा भारतीय व्यापार पर एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया और भारत में मुक्त व्यापार की नीति अपनाई गई। 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा उक्त अनुमति को कानूनी स्वरूप प्रदान किया गया। अब अंगेजी पूंजीपतियों को अपनी पूंजी भारत की चाय , काफी, नील और पटसन के बगीचों में लगाने की अनुमति मिल गई। असम के चाय बागानों के मालिकों ने अपने खेतों पर काम करने के लिए विशेष प्रकार की बंधुआ - मजदूरी की नीति अपनाई।