यूरोपीय कला-घनवाद

                                   घनवाद

    घनवादी कला में नियम एवं व्यवस्था को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
    घनवादी कला का जन्म 1907 ई0 में हुआ, और 1914 ई0 तक विभिन्न अवस्थाओं को पार करते हुए वह विकसित हुआ और उनको बहुत सारे अनुयायी मिले।
    यह शैली 1925 ई0 तक कला के क्षेत्र में सबसे सामर्थशाली एवं प्रेरणादायक कला शैली के रूप में बनी रही।
    वास्तुकला, उद्योगकला, विज्ञानशिल्प, दृश्यकला, अलंकरण आदि सभी क्षेत्रों में घनवादी कला का प्रभाव आज तक देखा जा सकता है।
    घनवाद मुख्यतया जड़वादी दृष्टिकोण की कला है, जिसमें मानवीय भावनाओं की उपेक्षा की गई है।
    वस्तुतः घनवादी कलाकारों ने मानवतावादी विचारों को त्यागकर कलाकृतियों का निर्माण ज्यामितीय रूप में ढालकर किया है।
    घनवादी कला के अन्तर्गत किसी वस्तु को जैसे हम देखते है, वैसे चित्रित नहीं किया गया बल्कि ज्यामितीय स्वरूप में उसके रूप तथा आकार को पुनः प्रस्तुत किया गया। इस कला में परिप्रेक्ष्य के सिद्धान्त का पालन नहीं किया गया है।
    घनवादी कला को मूल प्रेरणा उत्तरप्रभाववादी चित्रकार सेजान की कला से मिली। सेजान का कहना था कि प्रकृति को वृत्त, गोल व शंकु के आकारों में देखते हुए चित्रित करना चाहिए।
    घनवादी कला को फाववाद तथा नीग्रो कला से भी काफी प्रेरणा मिली।
    चित्रकार ब्राक द्वारा बनाये गये लेस्ताक के प्राकृतिक चित्र को देखकर 1908 ई0 में कला समीक्षक राक्सेल ने उनकी कला को पहली बार घनवादी कहकर सम्बोधित किया, लेकिन घनवाद के प्रवर्तक- पिकासो माने जाते है। 1907 ई0 में इनके द्वारा बनाया गया चित्र अविन्यो की स्त्रियाँ पहला घनवादी चित्र माना जाता है।
    1908 ई0 में ब्राक द्वारा बनाया गया चित्र विवस्त्र स्त्री उनका पहला घनवादी चित्र माना जाता है। लेकिन पिकासो द्वारा बनाया गया चित्र अविन्यों की स्त्रियाँ मातिस के चित्र जीवन आनन्द (श्रवल व िसपमि) से प्रभावित है।
    घनवाद की आधारभूमि सेजा ने तैयार की लेकिन पिकासो एवं ब्राक को इसका प्रवर्तक माना जाता है।
    1909 ई0 में पिकासो ने अपना चित्र तीन स्त्रियाँ पूर्ण किया जो अविन्यों की स्त्रियों का विकसित रूप है।
    1910-1911 ई0 के पिकासो व ब्राक के घनवाद को परिसीमित घनवाद कहा गया है, जो विश्लेषणात्मक घनवादी शैली का विकसित रूप था।
    1912 ई0 में घनवादी चित्रकारों ने कपड़ा, दीवार, कागज, समाचार पत्र, ताश, वेंत की जाली, माचिस आदि वस्तुओं के टुकड़ों को चित्र क्षेत्र में चिपकाकर ऊपर से सांकेतिक रेखाओं व रंगों की सहायता से चित्र रचना शुरू की व आधुनिक कला में कोलाज पद्धति का जन्म हुआ।
    पिकासो का चित्र वेंत की कुर्सी पर वस्तु समूह 1912 ई0 में घनवाद का प्रथम कोलाज चित्र माना जाता है।
    1925 ई0 में पिकासो ने तीन नर्तक नामक चित्र बनाकर घनवाद से विदा ली।
    घनवादियों की आकृतियों का रूप कोणात्मक है। घनवादियों के सभी चित्र आकार ज्यामितीय होते है, तथा रचना सम्बन्धी सिद्धान्त घनवाद की विशेषता है।
    संश्लेषणात्मक घनवाद का प्रवर्तक - पिकासो
    विश्लेषणात्मक घनवाद का प्रवर्तक - पिकासो
    कोलाज पद्धति का प्रवर्तक - ब्राक
 

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